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jyotirmath history : ज्योतिर्मठ (ज्योतिष्पीठ) एक परिचय jyotirmath shankaracharya ji

बुधवार, 14 सितंबर 2022 | सितंबर 14, 2022 WIB Last Updated 2022-09-14T14:38:53Z
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jyotirmath history : अनंतश्री विभूषित आद्यशङ्कराचार्य जी (Adi Shankaracharya ji) ने सुदूर केरल प्रदेश के कालटी ग्राम में अवतार लिया था। संन्यास ग्रहण कर उन्होंने सम्पूर्ण भारतवर्ष का परिभ्रमण किया और अपने समय में प्रचारित अवैदिक मतों का खण्डन कर उन्होंने वैदिक सनातन धर्म की पुनर्स्थापना की, ताकि सनातन धर्म की मर्यादाएँ सुरक्षित रहे और उसके विरोधी अवैदिक मतों का प्रचार कर लोगों को दिग्भ्रमित न कर सकें। इसके लिए आचार्यश्री ने महनीय प्रयास किया।


jyotirmath history


शंकराचार्य जी द्वारा स्थापित चार पीठ | shankaracharya math list in hindi



Adi Shankaracharya ji ने भारत की चारों दिशाओं में धर्म की चार राजधानियाँ स्थापित की।


  • उत्तर में बदरीनारायण के समीप ज्योतिष्पीठ,
  • पूर्व पुरी में गोवर्धनपीठ,
  • पश्चिम में द्वारका शारदापीठ
  • तथा दक्षिण में शृङ्गेरीपीठ।


 उपर्युक्त पीठों की मर्यादा अक्षुण्ण बनी रहे एतदर्थ उन मठों पर अपने चार शिष्यों को पदासीन किया, उन्हें शङ्कराचार्य नाम से अभिहित किया तथा उक्त पीठ पर पदासीन होने वाले भावी आचार्य की योग्यता को निर्धारित कर मठाम्नाय एवं महानुशासन का प्रवर्तन किया।



इसमें शङ्कराचार्य पद धारण करने वाले व्यक्ति के लिए आवश्यक योग्यताओं के निर्धारण के साथ-साथ मठों के महानुशासनार्थ अनेक नियमों-उपनियमों का भी समावेश किया गया है। आचार्य की यह इच्छा थी कि मूर्धन्य कोटि के विद्वान्, सदाचारी, सपोनिष्ठ, वेद-वेदाङ्गादिविशारद एवं सर्वशास्त्रों के ज्ञाता ही उक्त पद को धारण करें। इसलिए वहाँ कहा गया है कि


शुचिर्जितेन्द्रियो वेदवेदाङ्गादिविशारदः।


योगज्ञ: सर्वशास्त्राणां स मदास्थानमाप्नुयात् ॥


उक्तलक्षणसम्पन्नः स्याच्चेन्पत्पीठ भाग्भवेत्


अन्यथा रूढपीठोऽपि निग्रहार्हो मनीषिणाम् ॥


 आचार्य द्वारा विनिर्दिष्ट इन योग्यताओं के धारक ही शङ्कराचार्य पद पर आसीन हो सकते हैं । यदि उनमें ऐसी योग्यताएं नहीं है तो मनीषी तथा सनातन धर्मानुयायी संस्थाएँ पदारूढ़ होने पर भी अयोग्य व्यक्ति को पद से मुक्त कर सकती हैं। आचार्य द्वारा योग्यता निर्धारण के परिज्ञान के पश्चात् अब ज्योतिष्पीठ का ऐतिहासिक परिवेश में विवरण प्रस्तुत किया जा रहा है।



ज्योतिष्पीठ की परम्परा | jyotirmath history in hindi



आचार्य शंकर ने ग्यारह वर्ष की अवस्था में ही बदरीनाथ धाम की यात्रा की थी। उस समय बौद्धों ने बदरीनाथ धाम में मंदिर को ध्वस्त कर भगवान की प्रतिमा को नारदकुण्ड में फेंक दिया था। आचार्यजी ने योग बल से उस प्रतिमा को ढूंड निकाला तथा उसे मंदिर में स्थापित कर दिया। उन्होंने ध्वस्त मंदिर का पुनर्निर्माण करा दिया।


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बदरीनाथ में शीतकाल में अत्यधिक बर्फ गिरती है, इसलिए उन्होंने बदरीनाथ में स्थापित मंदिर का स्थायी कार्यालय जोशीमठ में बनाया। " पुराणों में ज्योतिर्मठ ( jyotirmath ) को गुप्त वीर्य कहा गया है" । वहाँ पर ब्रह्मज्योति का स्थायी रूप में निवास है तथा वह ज्योति मुक्तिदायी है। यहीं पर आचार्य जी ने दो वर्षों तक तप का वरण किया और उन्हें उस ज्योति के दर्शन हुए। इस ज्योति को धर्मज्योति भी कहा जाता है। इसी ज्योति के प्रकाश से आचार्यपाद ने विधर्मियों के मतों का खण्डन कर सनातन वैदिक धर्म की मर्यादा को अक्षुण्ण बनाये रखने में महनीय सफलता प्राप्त की। इस ज्योति का प्रताप उनके द्वारा स्थापित ज्योतिष्पीठ पर पदासीन शङ्कराचार्य में दिखाई पड़ता है।



ज्योतिर्मठ के प्रथम शङ्कराचार्य jyotirmath shankaracharya ji



ज्योतिर्मठ के प्रथम शङ्कराचार्य आचार्यपाद ने अपने प्रिय शिष्य तोटकाचार्य को ज्योतिर्मठ ( jyotirmath shankaracharya) के प्रथम आचार्य पद पर आसीन किया और अपने द्वारा पुनस्थापित भगवान बदरीनारायण की पूजा-अर्चना का भार उन्हीं के ऊपर छोड़ दिया। तब से शङ्कराचार्य की व्यवस्था में ही बदरीनारायण मंदिर की पूजा व्यवस्था चलती रही। इसमें इक्कीस आचार्य चिरजीवी थे। 21 और आचार्य थे जिनका नाम बदरीनाथ मंदिर की परम्परा में उल्लिखित है।

ज्योतिर्मठ के सम्वत् 1833 तक पदारूढ़ आचार्य जगद्गुरु शङ्कराचार्य स्वामी रामकृष्णाश्रम थे, जिनका नाम परम्परासूची में दर्ज है । उनके ब्रह्मीभूत हो जाने पर मठाम्नाय एवं महानुशासन वर्णित योग्यताओं का धारक व्यक्ति न मिल सका।



लगभग 165 वर्षो तक रिक्त पड़ी रही गद्दी |  jyotirmath history in hindi 



 इसी बीच गढ़वाल राज्य की तत्कालीन राजनीतिक एवं भौगोलिक परिस्थितियाँ बद से बदतर होती गई। फलतः ज्योतर्मठ की गद्दी सम्वत् 1998 तक (लगभग 165 वर्षो तक) रिक्त पड़ी रही। इस बीच मंदिर की पूजा अर्चना का भार टिहरी गढ़वाल नरेश के आदेश से वहाँ के पुजारी (जो बाल ब्रह्मचारी होते थे और जिन्हें 'रावल' की उपाधि दी गई थी) को सौंप दिया गया । यह व्यवस्था सम्वत् 1997 (सन् 1940) ई. तक चलती रही।


 पूजन अर्चन की इस वैकल्पिक व्यवया के साथ-साथ शङ्कराचार्य की गद्दी अविच्छिन्न रूप में बदरीनाथ के मंदिर में लगती रही, जिसे आज भी बदरीनाथ मंदिर और जोशीमठ के नरसिंह मंदिर में देखा जा सकता है। ज्योतिर्मठ के आचार्यविहीन होकर जीर्ण-शीर्ण हो जाने पर आचार्य शङ्कर एवं तोटकाचार्य की गुफाएँ, अमर शहतूत वृक्ष और भगवान ज्योतिरीश्वर से सभी अवशेष मठ का पता निर्देश करने के लिए अस्तित्व में बने रहे।


jyotirmath in which state - सम्वत् 1958 (सन् 1901) में भारत धर्म महामण्डल की स्थापना हुई थी स्थापना के 35 वर्षों बाद श्री भारत धर्म महामण्डल के उत्कर्ष काल में संवत् 1995 के आस पास इसके संस्थापक पूज्यपाद स्वामी ज्ञानानन्द सरस्वती जी महाराज का ध्यान ज्योतिर्मठ की ओर गया और उन्होंने अन्य तीन पीठ के शङ्कराचायों तत्कालीन राजाओं-महाराजाओं और सनातन धर्म के विद्वानों की सहमति से ज्योतिर्मठ के लगभग विच्छिन्न अवशेषों की खोज हेतु एक शिष्ट मण्डल बदरिकाश्रम भेजा तथा उसकी जानकारी के आधार पर जोशीमठ का भूमि का पता लगाया।


तोटकाचार्य की गुफा के आधार पर उन्होंने मठ की भूमि निश्चित करके टिहरी गढ़वाल के तत्कालीन जिलाधीश महोदय के सौजन्य से वह भूमि भी ज्योतिर्मठ के लिए प्राप्त कर ली जो सरकारी कागजातों में ज्योतिर्मठ के नाम से अंकित चली आ रही थी।


इसके पश्चात् स्वामी ज्ञानानन्द जी महाराज ने भारत धर्म महामण्डल के तत्वाधान में अन्य तीन पीठ के शङ्कराचायों, राजाओं-महाराजाओं एवं सनातन धर्म के विद्वानों के सहयोग से परम विद्वान, मनीषी, त्रिकालदर्शी एवं परम तपस्वी स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती जी को मठाम्नाय एवं महानुशासन में वर्णित सभी योग्यताओं का चारक मानकर ज्योतिर्मठ के शङ्कराचार्य पद पर चैत्र शुक्ल चतुर्थी सम्वत् 1998 को अभिषित कर दिया।


इसकी घोषणा श्री भारत धर्म महामण्डल के तत्कालीन सभापति श्रीमान् महाराजाधिराज सरकार कामेश्वर सिंह बहादुर  ने काशी के अखिल भारतीय सनातन धर्म के महासम्मेलन में की। स्वामी ज्ञानानन्द जी महाराज ने जो भूमि प्राप्त की उस पर उन्होंने पूर्णाम्बा तथा ज्योतिरीश्वर के मंदिरों तथा ज्योतिर्मठ का निर्माण किया एवं काशी की वरुणा तट की भूमि को मिलाकर एक ट्रस्ट डीड बनाई और उन्हें (श्री स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती जी महाराज को) एकमात्र ट्रस्टी बना दिया।


ब्रह्मानन्द सरस्वती जी महाराज का शङ्कराचार्य पद पर चैत्र शुक्ल चतुर्थी सम्वत् 1998 तदनुसार सन् 1941 ई. में काशी में ही अभिषेक हुआ था। उन्होंने 12 वर्षों तक शङ्कराचार्य पद के गुरुतर भार का उत्तरदायित्व पूर्ण ढंग से निर्वाह किया, उचछिन्न ज्योतिर्मट के जीर्णोद्धार की व्यवस्था की और मठ के लगभग सभी अधूरे कार्यों को पूर्णता प्रदान की। सन् 1953 ई. की 21 मई को स्वामी ब्रह्मानन्द जी महाराज ब्रह्मलीन हो गए।


भारत धर्म महामण्डल ने स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती जी महाराज के योग्यतम शिष्य परम वीतराग धर्मसम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज को उस पद पर अभिषिक्त करना चाहा परन्तु पूज्यवर ने इसे स्वीकार नहीं किया, तब अपने घोषणा पत्र से प्राप्त अधिकार को आधारतः लेते हुए श्री भारत धर्म महामण्डल ने अन्य पीठों की सहमति सनातनधर्मानुयायी संस्थाओं एवं वर्णाश्रम धर्मनुयादी विद्वानों की उत्कृष्ट इच्छा एवं पूज्य स्वामी करपात्री जी महाराज की सहर्ष स्वीकृति से योगिराज परम तपस्वी स्वामी कृष्णबोधाश्रम जी महाराज को ज्योतिर्मठ (jyotirmath) के श्री शङ्कराचार्य पद पर अभिषिक्त कर दिया।



उस पट्टाभिषेक समारोह में द्वारका शारदापीठ के तत्कालीन जगद्गुरु शङ्कराचार्य स्वामी अभिनव सच्चिदानन्द तीर्थ जी महाराज धर्मसम्राट् परमपूज्य अनन्तश्रीविभूषित स्वामी करपात्री जी महाराज पूज्यपाद स्वामी स्वरुपानन्द सरस्वती जी महाराज, पं. द्वारका प्रसाद शास्त्री स्वामी विष्णुदेवानन्द सरस्वती जी महाराज तथा स्वामी परमानन्द सरस्वती जी महाराज आदि भी उपस्थित थे।



इन सभी लोगों ने काशी में स्वामी कृष्णबोधाश्रम जी महाराज का अभिषेक किया था। वे लगभग 20 वर्षो तक ज्योतिर्मठ के शङ्कराचार्य पद पर विद्यमान रहे जब से अस्वस्थ हो गए तो उन्होंने उक्त पद के गुरुतर भार को वहन करने में अपनी असमर्थता व्यक्त की तथा धर्मसपाट पूज्य स्वामी करपात्री जी महाराज सनातन धर्मानुयायी संस्थाओं, श्री भारत धर्म महामण्डल, काशी विद्वत परिषद्, अखिल भारतीय धर्मसंघ को यह सूचित करवाया कि उनके स्थान पर पूज्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती जी महाराज का ज्योतिर्मठ के शङ्कराचार्य पद पर अभिषेक कर दिया जाए।



jagat guru shankaracharya swami swaroopanand saraswati ji



 उनके इस प्रस्ताव को सभी संस्थाओं ने सहर्ष स्वीकार कर लिया। सन् 1973 ई. में पूज्यपाद स्वामी कृष्णबोधाश्रम जी महाराज के ब्रह्मीभूत हो जाने के पश्चात उनकी इच्छा का सम्मान करते हुए दिल्ली में अत्यन्त धूम-धाम से ज्योतिर्मठ के शङ्कराचार्य पद पर करपात्री जी महाराज ने अनन्य स्नेहपात्र सहयोगी स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती जी महाराज का अभिषेक किया।



उक्त अभिषेकोत्सव में द्वारका और पुरी के तत्कालीन शङ्कराचार्य जी महाराज स्वयं पधारे थे। श्रङ्गेरी के जगदगुरु जी महाराज के प्रतिनिधि उनकी ओर से उपस्थित हुए थे। भारत धर्म महामण्डल, अखिल भारतीय धर्मसंघ तथा काशी विद्वत परिषद् के प्रतिनिधियों ने उक्त अभिषेक में सक्रिय भाग लिया था तथा सम्पूर्ण कार्यक्रम धर्मसम्राट पूज्यपाद अनन्तीविभूषित स्वामी करपात्री जी महाराज के तत्वावधान में संचालित हुआ था तब से लेकर आजतक पूज्यपाद अनंतश्री विभूषित स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती जी महाराज जगदगुरु शङ्कराचार्य पद के भार का अत्यंत प्रभावि ढंग से निर्वहन कर रहे हैं।



तीनों पीठों के शङ्कराचार्य, सनातन धर्मानुवासी संस्थाओं, वर्णाश्रम धर्मानुयायी विद्वानों एवं धर्मसम्राट पूज्यपाद करपात्री जी महाराज ने स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती महाराज को शुचि, जितेन्द्रिय, वेद-वेदाङ्गविशारद एवं सभी शास्त्रों के समन्वय का ज्ञाता मान्य करते हुए ज्योतिर्मठ पर अभिषिक्त किया था। उनके इन्हीं गुणों से प्रभावित होकर तथा समाज कल्याण के लिए उनके द्वारा किये गए कार्यों का मूल्यांकन करते हुए द्वारका शारदापीठ के तत्कालीन शङ्कराचार्य स्वामी अभिनव सच्चिदानन्द तीर्थ जी ने उन्हें योग्यतम आचार्य स्वीकार किया तथा अपनी अन्तिम इच्छा पत्र ( वसीयत) में 'द्वारका शारदापीठ के शङ्कराचार्य पद पर स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती जी महाराज का अभिषिक्त किया जाए ऐसा लिखा।


तब शृङ्गेरी के तत्कालीन जगद्गुरु शङ्कराचार्य स्वामी अभिनव विद्यातीर्थ जी महाराज द्वारा द्वारका शारदापीठ पर स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती जी को अभिषिक्त किया गया। तब से आज तक परमपूज्य श्रीचरण दोनों के आचार्य पद का गुरुतर भार वहन करते आ रहे हैं।


सन् 1973 ई. से ज्योतिष्पीठ के आचार्य पद का भार वहन कर पूज्य श्रीचरण अनेक लोकोपकारी कार्यों का सम्पादन जिस तत्परता से करते आए हैं उससे उन्होंने अपने संन्यास की सार्थकता सिद्ध कर दी है। संन्यास धर्म का एक अत्यन्त महत्वपूर्ण लक्ष्य, मानवता की सेवा कर उस ऋण का अपाकरण करना है जिसे महाभारतकार ने मनुष्य की संज्ञा दी है। इसीलिए सम्पूर्ण देश ने ज्योतिष्पीठारोहण महोत्सव के 25 वर्ष पूरे होने पर मानवता की सेवा की तन्मयता और सार्थकता को देखकर इसकी रजत जयन्ती मनाने का संकल्प लिया एवं पूर्ण मनोयोग से यह महोत्सव देश के कोने-कोने में अत्यन्त श्रद्धा के साथ मनाया गया।


 यही इन महामनीषी के संन्यास धर्म की भौतिक सार्थकता थी जिसे राष्ट्रीय मंच ने मूर्तरूप देकर गुरुऋण से स्वयं को मुक्त किया। भक्तों, देशवासियों एवं विशेषकर समाज के दुर्बलतम वर्गों के  भौतिक एवं आध्यात्मिक उन्नति के लिए महाराजश्री ने संन्यासी रूप में जो महान कार्य किए हैं, उसका समादर देश आज उनके संन्यास की स्वर्णजयन्ती महोत्सव को आयोजित कर कर रहा है।  ज्योतिपीठ की अक्षुण एवं महान परम्पराएं जीवन्त हो उठी हैं और भगवान् आद्य शंकराचार्य को निश्चित रूप से परमपूज्य श्रीचरणों के महनीय कार्यों का अवलोकन कर अत्यन्त आनन्द का अनुभव हो रहा होगा।


 क्योंकि पूज्य महाराजश्री ने ज्योतिष्पीठ के शङ्कराचार्य के रूप मे उन सभी लक्ष्यों को प्राप्त कर लिया और उन सभी भूमिकाओं का निर्वहन कर दिया जिनके लिए भगवान् शङ्कराचार्य ने इस पीठ की स्थापना की थी।


पूज्य महाराजश्री वर्तमान में देश के सर्वाधिक लगभग 73 मातुर्मास्य कर चुके वरिष्ठ सन्यासी है।


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