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अंग्रेजी भाषा एक षडयंत्र : हम क्या थे और क्या बन गय , हमारा इतिहास

सोमवार, 13 सितंबर 2021 | सितंबर 13, 2021 WIB Last Updated 2021-09-13T06:05:44Z
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 आज अंग्रेजी बोलना अपने आप वैल सैटिल्ड या आधुनिक पर्सनैलिटी का प्रतीक माना जाने लगा है। आज अंग्रेजी की अनिवार्यता इतनी क्यों बढ़ गई है, इसका एक विशेष कारण है। मातृभाषाओं में दी जाने वाली देशी शिक्षा पद्धति को ध्वस्त करने और अंग्रेजी शिक्षा पद्धति को मजबूत बनाने में 1854 में सर चार्ल्स वुड द्वारा लाए गए वुड डिस्पैच और मैकाले के 'प्लान' ने अति महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।


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पाश्चात्य संस्कृति से रंगने का एक नायाब एवं सार्थक तरीका


भारतीय शिक्षा के इतिहास में यहां से एक महत्वपूर्ण मोड़ आया और शिक्षा की एक ऐसी नींव रखी गई, जिसने ब्रिटिश हुकूमत की जरूरतों की आपूर्ति करने वाली पीढ़ियों के निर्माण का सिलसिला आरम्भ किया। देखते ही देखते भारतीय समुदाय में एक ऐसा वर्ग तैयार होने लगा, जो विदेशी शासकों की भाषा बोलने लगा और उस भाषा के वर्चस्व कायमी की वकालत भी करने लगा। फिरंगी हुक्मरानों ने इस पीढ़ी को विशेष महत्व और अंग्रेजी शिक्षा को बढ़ावा देने की दृष्टि में औपनिवेशिक सेवा के उच्च पदों को अंग्रेजी से जोड़ देने की सरकारी नीति ही लागू कर दी। भारतीय युवकों को पाश्चात्य संस्कृति से रंगने का यह एक नायाब एवं सार्थक तरीका था। 


नतीजतन, एक ऐसे वर्ग की जड़े गहरी होती चली गईं, जो अपने को देशी शिक्षा से ही नहीं, समग्र भारतीय राष्ट्रीयता से ही अलग मानने लगे। अंग्रेज शिक्षा शास्त्री लाइटनर ने इस तथ्य की पुष्टि करते हुए कहा भी-'भारत में जहां भी अंग्रेजी विद्यालय का प्रभाव बढ़ा, वहां से राष्ट्रीय बौद्धिकता के चिन्ह लुप्त होते चले गये।' मातृभाषा में देशी शिक्षा का पाठ पढ़ाने वाले विद्यालयों की समाप्ति की जो शुरुआत हुई, उसके साथ ही लोक गीत, लोक कथाएं, बोध कथाएं, पुराण कथाएं और जातक कथाओं के भी लुप्त होने की शुरुआत हो गई।


हमारी परंपरा सम्पूर्ण वातावरण को उर्जावान बनाती थी 


 यह ऐसा जड़ों से जुड़ा पारंपरिक लोक साहित्य था, जो ग्राम समुदाय में परस्पर सद्भाव, जीवन्तता और उमंग एक साथ पैदा करता था, और ग्राम समुदाय के संपूर्ण वातावरण को ऊर्जावान बनाता था। नैतिक सदाचार और सामाजिक मूल्यों के प्रति दायित्व निर्वाह की भावना बनाए रखने में इस साहित्य का अमूल्य योगदान था। जीवन के जरूरी सरोकारों के प्रति जागरूक बनाए रखने में भी लोक साहित्य ने अहम् भूमिका निभाई।


मानव जाति को नैतिक शिक्षा का पाठ पढ़ाने और उसके अनगढ़ व्यक्तित्व में व्यवहारिक आचरण के बीज डालने की शुरूआत नाना-नानी और दादा-दादी द्वारा रात को सोते समय जो कहानियां सुनाई जाती थीं, उनसे होती थी। ये कहानियां चरित्र निर्माण का दृढ़ आधार थीं। इन कहानियों में सत्य और नैतिक बल इस तरह गुंफित होते थे कि कहानी सुनते-सुनते बाल मन पर ऐसा प्रभाव पड़ता था, जो उनमें झूठ और अनैतिकता के प्रति नफरत पैदा करता था और जीवन को सत्य, श्रम और संघर्ष से जोड़ने के अद्वितीय भावों का संचार करता था। बाल मन की अनगढ़ और गीली माटी पर ऐसे संस्कारजन्य भावों की संरचना होती थी, जो व्यक्ति को जीवनपर्यन्त सामाजिक दायित्वों के प्रति ईमानदार एवं निष्ठावान बनाए रखते थे।


हमारे विचार हमारे संस्कार कहा लुप्त हो गय


अंग्रेजी ने जिस चतुराई से देशी भाषाओं में दी जाने वाली शिक्षा पद्धतियों को नष्ट करना शुरू किया और उसके सामने आए उनके चलते एक तो हम अपने सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा पूरी तरह नहीं कर पाए, दूसरे हम समाज को परिवर्तन के लिए तैयार नहीं कर पाए। नतीजा यह निकला कि जिन मूलभूत अवधारणाओं के जरिये हम समाज में व्याप्त जिन शाश्वत मूल्यों को जीवंत बनाए रखते थे, वे मूल्य न तो शाश्वत रह पाए और न ही जीवंत। लिहाजा इन मूल्यों के जरिये जिस शैक्षिक, बौद्धिक व प्रतिबद्ध विचारधारा के संस्कार निर्मित होते. थे, वे लुप्त होते चले गए। 


बीते पचास सालों में मानवताविहीन एक ऐसा ढांचा बना जो केवल प्राद्योगिक और सूचनात्मक जानकारियों से भरा था। कम्प्यूटर के चलन और विस्तार के बाद इस ढांचे को और मजबूती मिली और शिक्षित व्यक्ति एक मशीनी मानव के रूप में सामने आने लगा। इस मानव का वास्ता सामाजिक पुनर्रचना करने की बजाय खुद की आर्थिक पुनर्रचना करने रहा। शिक्षा के ऐसे ढांचों में परिवर्तन की संभावनाओं को खोजने के लिए जितने भी शिक्षा आयोग गठित किये गए, उन सभी ने निष्कर्ष निकाले कि मूल्य आधारित शिक्षा का चलन कम से कम प्राथमिक कक्षाओं तक मातृभाषाओं में होना निहायत जरूरी है। 

ज्यादा मातृभाषा से तात्पर्य मां और बेटे के बीच होने वाले वार्तालाप तक सीमित नहीं है। यदि कोई कन्नड़ भाषी मां अपने बेटे से अंग्रेजी में वार्तालाप करती है तो उसका अर्थ यह कदापि नहीं लगाना चाहिए कि बेटे की मातृभाषा अंग्रेजी हो गई है। बेटा जब घर से बाहर आकर अपने मित्रों के साथ खेलेगा तो वह या उसके मित्र अंग्रेजी में बातचीत करने की बजाय उस परिवेश की भाषा में बात करेंगे। अर्थात परिवेश की भाषा उसकी भाषा कहलाएगी।


बच्चे अंग्रेजी नहीं पड़ेंगे तो पिछड़ जायगे

 

भारतीय जनमानस में एक धारणा यह भी व्याप्त है कि यदि वे अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों में नहीं पढ़ाएंगे तो उनके बच्चे औरों की तुलना में पिछड़ जाएंगे। दिल्ली में दो पब्लिक स्कूल ऐसे हैं, जिनका प्राथमिक स्तर तक शिक्षा का माध्यम हिन्दी है। इन विद्यालयों का परिणाम इस धारणा पर पलीता लगाने के लिए पर्याप्त है कि केवल अंग्रेजी माध्यम से पढ़े छात्र प्रतिभावान एवं समर्थ होते हैं।


इसका दूसरा पहलू अंग्रेजी के फैलाव में उपभोक्तावादी दूरदर्शन ने चमत्कारिक योगदान किया है। अब वह समस्त भारत में बाजार की भाषा बन गई है। अंग्रेजी का विस्तार एवं उसका उपयोग करने वाला मध्यवर्ग आज कहीं अधिक आश्वस्त करने वाला है। यह एक बड़ा वर्ग है जो अंग्रेजी अनिवार्यता को स्वीकार करने लगा है।


यह नया चरण अंग्रेजी का नई चाल में ढलने का है। यह नई चाल एक ही साथ उपभोक्ता क्रांति का परिणाम भी है और कारक भी है। जहां तक काम का प्रश्न है, वर्तमान युवा पीढ़ी के लिए अंग्रेजी एक आवश्यकता है, जिसका नैतिकता से कोई सम्बंध नहीं है। लेकिन अंग्रेजी ने रोजगार या कैरियर में अपना प्रभुत्व इतना मजबूत बना लिया है कि इसके बिना कोई युवा सफल हो ही नहीं सकता, चाहे कम्प्यूटर की नौकरी हो, सेल्समैनशिप हो, फैशन एवं डिजाइनिंग हो, सब पर अंग्रेजी का ही वरदहस्त है।

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