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Tulsi vivah 2021 : तुलसी विवाह व्रत कथा |गन्ना ग्यारस की कथा

बुधवार, 25 नवंबर 2020 | नवंबर 25, 2020 WIB Last Updated 2021-04-01T09:34:39Z
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जय श्री कृष्ण - आज तुलसी शालिग्राम विवाह है। आज हम जानेंगे (Tulsi vivah vrat katha 2021) आज के दिन को लोग कई प्रकार के नाम से जानते जैसे- देवोत्थान एकादशी, देव् उठनी ग्यारस, गन्ना ग्यारस, तुलसी शालिग्राम विवाह,(tulsi vivah 2021 ), tulsi shaligram vivah ekadashi, जैसे कई नामो से जाना जाता है।आज के दिन को नय जीवन की शुरुआत का दिन भी कहा जाता है, आज के दिन की ekadashi ki katha का बड़ा महत्व है। कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी ( gyaras ) को देवोत्थान एकादशी (devutthan ekadashi) कहते हैं ।





कहा जाता है कि भगवान विष्णु आषाढ़ शुक्ल एकादशी ( gyaras ) को 4 माह के लिए छीर सागर में शयन करते हैं । चार माह उपरांत कार्तिक शुक्ल एकादशी ( ग्यारस ) को जागते हैं । आइये जानते है Tulsi vivah vrat katha विस्तार से।





Tulsi vivah : तुलसी विवाह व्रत कथा | गन्ना ग्यारस की कथा





कार्तिक शुक्ल एकादशी को जो मनुष्य तुलसी का विवाह (Tulsi vivah) भगवान से करते हैं, उनके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं । तुलसी को विष्णुप्रिया भी कहते हैं।नवमी, दशमी व एकादशी को व्रत एवं पूजन कर अगले दिन तुलसी का पौधा किसी ब्राह्मण को देना भी शुभ माना गया है ।





कार्तिक मास में स्नान करने वाली स्त्रियां कार्तिक शुक्ल एकादशी को शालिग्राम और तुलसी का विवाह (Tulsi vivah) बड़े बाजे गाजे बाजे के साथ संपन्न कर सौभाग्य प्राप्त करती हैं । प्राचीन काल में जालंधर नाम का एक राक्षस चारों ओर उत्पात मचाया था । वह वीर और पराक्रमी था । उसकी वीरता का रहस्य था उसकी पत्नी वृंदा का पतिव्रता धर्म । उसी के प्रभाव से वह शत्रुजयी बना हुआ था ।





जालंधर के उपद्रवों से भयभीत होकर ऋषि व देवता भगवान विष्णु के पास गए और उनसे अपनी व्यथा सुनाई। इस पर भगवान विष्णु ने वृंदा का पति धर्म भंग करने का निश्चय किया और योग माया द्वारा एक मृत शरीर को घर के आंगन में फिकवा दिया । वृंदा को वह शव अपने पति का दिखलाई दिया । तत्क्षण वह शव पर गिरकर विलाप करने लगी । उसी समय वहां एक साधु आया और उसने वृंदा को विलाप करते देख उसने शव में जान डाल दी । चूँकि भावातिरेक में वृंदा ने उस शव का आलिंगन कर लिया था, अतः उसका पति धर्म नष्ट हो गया। उसी समय जालंधर देवताओं से युद्ध करते हुए मारा गया । 





वृंदा को वास्तविकता का ज्ञान होते ही, उसने विष्णु भगवान को श्राप दिया कि जिस प्रकार तुमने छल से मुझे पति वियोग दिया उसी प्रकार तुम भी स्त्री वियोग सहने के लिय मृत्यु लोक में जन्म लोगे । इसके साथ वह पति के साथ सती हो गई । उसी शाप के अनुसार कालान्तर के समय रामजी को सीता जी का वियोग सहना पड़ा ! तब विष्णु जी ने कहा - हे वृन्दा ! तुम मुझे लक्ष्मी से भी अधिक प्रिय हो गई हो ! यह तुम्हारे सतीत्व का ही फल है की तुम तुलसी बनकर मेरे साथ रहोगी . जो मनुष्य तुम्हारे साथ मेरा विवाह करेगा, वह परमधाम को प्राप्त होगा . इसी कारण शालिग्राम या विष्णु - शिला की पूजा, बिना तुलसी दल के अधूरी मानी जाती है . अतः तुलसी विवाह और तुलसी पूजा का बड़ा महत्व है .





Tulsi vivah कथा सुनने के बाद देवताओ को एसे उठाते है





उठो देव सावरे बेर भाजी खाओ रे , क्वारें को व्याहो रे , व्याहिन् को गोनो रे





Ekadashi ki katha ( देवोत्थान एकादशी )





पुराणों के अनुसार Tulsi vivah कथा के अलावा एक और कथा प्रचलित है ekadashi ki katha के अनुसार विष्णु जी के शयन काल के चार मासों में विवाह आदि मांगलिक कार्य वर्जित रहते हैं । मतलब इन 4 महीनों में आप विवाह और अन्य मांगलिक कार्य नहीं कर सकते। विष्णु जी के जागने के बाद ही सभी मांगलिक कार्य शुरू किए जाते हैं ।





एकादशी व्रत कथा ( ekadashi vrat katha  )





एक राजा के राज्य में एकादशी ( gyaras ) के दिन कोई भी अन्न नहीं बेचता था । उस दिन सब फलाहार पर रहते थे। एक दिन भगवान ने उस राजा की परीक्षा लेने के विचार से एक सुंदरी का रूप धारण कर लिया ।





राजा ने उसे देखकर पूछा कि तुम कौन हो इस पर वह स्त्री बोली मैं निराश्रित हूं, यहां कोई मेरा परिचित नहीं,में यहां किसी को नही जानती हूं । में यहां किससे सहायता मांगू । राजा उसके रूप और सौंदर्य पर मोहित होकर राजा ने उसे महल चलकर रानी बनकर रहने का आग्रह किया । सुन्दरी बोली रानी का अधिकार मुझे दोगे तो मैं साथ चलूंगी, राजा ने उसकी सारी बातें स्वीकार कर ली और अपने महल में ले आया ।





महल में आकर उसने एकादशी के दिन राजा से भोजन करने को कहा । किंतु राजा ने इनकार कर कहा कि वह आज केवल फलाहार पर रहेगा । वह बोली कि यदि तुम भोजन ना करोगे तो मैं तुम्हारे बड़े राजकुमार का शीश काट लूंगी । इस पर राजा ने कहा कि तुम जैसा चाहो करो किन्तु वो अपने धर्म से विमुख ना होंगे । एकाएक रानी के रूप से भगवान विष्णु ने प्रकट होकर कहा राजन तुम इस कठिन परीक्षा में पास हुए उसी समय वहां एक विमान आया और राजा ने अपने पुत्र को अपना राज्य सौंप दिया और उस विमान में बैठकर बैकुंठ धाम को चला गया ।





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