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केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) के बारे में रोचक जानकारी

गुरुवार, 17 सितंबर 2020 | सितंबर 17, 2020 WIB Last Updated 2021-04-01T09:33:51Z
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CBI सीबीआई (Central Bureau of Investigation) परम्परागत अपराध जैसे हत्या, चोरी, डकैती इत्यादि का अन्वेषण अपने हाथों नहीं लेती है जब तक कि उच्चतम न्यायालय/उच्च न्यायालयों द्वारा निर्देश न दिया जाए या राज्य सरकारों के द्वारा सौंपा न जाए। यह इसलिए कि भारतीय संविधान के अंतर्गत “पुलिस” एक राज्य का विषय है एवं अपराधों के अन्वेषण का मौलिक क्षेत्राधिकार राज्य पुलिस की होती है। मामलों के अन्वेषण हेतु सीबीआई की शक्तियां (powers of cbi in hindi) दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम से प्राप्त होती है।





संघ शासित प्रदेशों में इस अधिनियम के तहत अधिसूचित अपराधों का अन्वेषण तथा राज्यों में राज्य सरकारों की सहमति से ही सीबीआई अन्वेषण कर सकती है। चूंकि सीबीआई एक छोटी कार्यबल है इसलिए प्रशासनिक रूप से भी सीबीआई के लिए यह लाभकर नहीं है कि वह परम्परागत अपराधों का अन्वेषण करें जबतक कि उसे उच्चतम न्यायालय/उच्च न्यायालयों द्वारा निर्देश न दिया जाए या फिर राज्य सरकारों के द्वारा न सौंपा जाए।





Central Bureau of Investigation |CBI







  • CBI भारत की सबसे बड़ी जांच एजेंसी है
  • CBI का पूरा नाम केन्द्रीय जांच ब्यूरो (Central Bureau of Investigation) या CBI है
  • भारत के लिये सीबीआई ही इन्टरपोल की आधिकारिक इकाई है
  • CBI एजेंसी की स्थापना 1941 में हुई थी
  • अप्रैल 1963 में इसे ‘केंद्रीय जाँच ब्यूरो’ नाम दिया गया
  • इसका मुख्यालय नई दिल्ली में है
  • CBI में शामिल होने के लिए आपको SSC बोर्ड द्वारा आयोजित परीक्षा को उतीर्ण करना होगा
  • दिल्ली विशेष पुलिस प्रतिस्ठान अधिनियम, 1946 द्वारा CBI को जाँच शक्तिया दी गई है
  • CBI केंद्र सरकार व राज्य सरकार की सहमति से राज्यों में अपराधो की जाँच कर सकती है
  • सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायलय राज्य सरकार की सहमती की बिना CBI को किसी भी राज्य में जाँच के आदेश दे सकते है
  • यह कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग के अधीन कार्य करती है
  • यद्यपि इसका संगठन फेडरल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन से मिलता-जुलता है किन्तु इसके अधिकार एवं कार्य-क्षेत्र एफबीआई की तुलना में बहुत सीमित हैं
  • Central Bureau of Investigation बड़े स्तर पर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय लेवल पर होने वाले अपराध जैसे की हत्या, घोटालो और अत्याचार के मामलो की जाँच भारत सरकार के आदेशो पर करती है
  • भारत सरकार की ओर से राष्ट्रीय हितों से जुड़े अपराधों की जांच का अधिकार भी इस एजेंसी के पास होता है
  • भारत सरकार द्वारा किसी राज्य सरकार की सहमति से उस राज्य से जुड़े मामलों की जांच का आदेश भी CBI को दिया जा सकता है
  • CBI की तरह ही CID होती है जहां CBI पूरे देश में कार्य करती है तो वहीं CID केवल एक राज्य तक सीमित होती है
  • CID किसी भी राज्यों में होने वाले अपराधिक मामलो और हमले के मामलो साहित प्रदेश में अन्य गैर क़ानूनी मामलो की जाँच करता है जबकि CBI देश तथा विदेश की मामलो की जांच करती है
  • CID के पास जितने भी मामले आते है उन्हें प्रदेश सरकार और हाई कोर्ट द्वारा सौंपा जाता है जबकि CBI को जाँच के मामले केंद्रसरकार, हाई कोर्ट और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सौंपे जाते है
  • केन्द्रीय अनुसंधान ब्यूरो प्रायः विवादों और आरोपों से घिरी रहती है इस पर केन्द्रीय सरकार के एजेंट के रूप में पक्षपातपूर्ण काम करने का आरोप लगता है






Central Bureau of Investigation | CBI संक्षिप्त विवरण





  1. द्वितीय विश्व युद्ध के प्रारंभ में भारत सरकार ने यह महसूस किया कि युद्ध के प्रयासों के लिए की गई खर्च में अधिक वृद्धि ने अनैतिकता और असामाजिक लोगों अर्थात् सरकारी और गैरसरकारी दोनों प्रकार के लोगों को रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार में सरकारी तथा आम जनता की लागत में संलिप्त पाया। यह महसूस किया गया था कि राज्य सरकारों के अधीन पुलिस तथा अन्य कानून को लागू करने वाली एजेंसियां इस तिथि को काबू करने में समर्थ नहीं थी, इसलिए भारत सरकार के युद्ध और आपूर्ति विभाग जो युद्ध से संबंधित थे, में रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार के मामलों की जांच करने के लिए एक पुलिस उपमहानिरीक्षक के अधीन 1941 में विशेष पुलिस स्थापना (एस.पी.ई.) के द्वारा एक्सीक्यूटिव ऑर्डर पारित किया। 1942 के अंत में एस.पी.ई. के कार्यक्षेत्र को बढ़ाकर रेलवे में भ्रष्टाचार मामलों सहित शामिल किया गया और इसलिए शामिल किया गया क्योंकि ये माना गया कि रेलवे युद्ध से संबंधित सामग्री की आपूर्ति और उसके आवाजाही से जुड़ा था।
  2. 1943 में, भारत सरकार ने एक अध्यादेश जारी किया जिसके तहत एक विशेष पुलिस बल गठित किया गया था और केंद्रीय सरकारों के विभागों जो ब्रिटिश भारत में कही भी हो, के विभागों से जुड़े कुछ अपराधों से जांच करने के लिए प्राधिकृत किया गया था। यहां तक कि युद्ध के समाप्त होने के बाद रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार के मामलों की जांच करने के लिए एक केंद्रीय सरकार एजेंसी की आवश्यकता समझी गयी। अत:, एक अध्यादेश 1943 में जारी किया गया जिसे 30 सितंबर, 1946 के द्वारा प्रतिस्थापित (रिप्लेश) कर दिया गया। बाद में, उसी वर्ष दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम, 1946 में अस्तित्व में लाया गया।
  3. केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) जांच करने के लिए दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम, 1946 से अधिकार प्राप्त करता है। अधिनियम की धारा 2 केवल संघ शासित क्षेत्रों में अपराधों की जांच करने की सीमा तय करती है। हालांकि, केन्द्रीय सरकार द्वारा इस सीमा को अन्य क्षेत्रों जिसमें रेलवे शामिल है, में बढ़ा सकती है तथा अधिनियम की धारा 5(1) के तहत राज्यों को अधिनियम की धारा 6 के तहत सहमति प्राप्त करने का अधिकार देती है। के.अ.ब्यूरो के कार्य कार्याधिकारों जो, उपनिरीक्षक या उससे ऊपर के हो, वे जांच के उद्देश्य के लिए संबंधित क्षेत्र के पुलिस स्टेशन के प्रभारी के रूप में सभी अधिकार का इस्तेमाल कर सकता है। अधिनियम की धारा 3 के अनुसार विशेष पुलिस स्थापना में यह भी अधिकार दिया गया है कि केवल उन मामलों की जांच करें जिन्हें समय-समय पर केंद्रीय सरकार द्वारा अधिसूचित किया गया हो।
  4. अधिनियम की उदघोषणा के बाद एसपीई का अधीक्षण गृह मंत्रालय को हस्तांतरित कर दिया गया और इसके कार्यक्षेत्र को केंद्रीय सरकार के सभी विभागों को कवर करते हुए बढ़ा दिया गया। एस.पी.ई. का कार्यक्षेत्र सभी संघ शासित राज्यों तक बढ़ा दिया गया और अधिनियम इसके विस्तार को राज्यों से लेकर ब्यूरो तक बढ़ाता है। हालांकि, 1948 में एक पुलिस महानिरीक्षक का पद एस.पी.ई. सृजित किया गया और इस संगठन को इनके तहत रखा गया।
  5. 1953 में एक प्रवर्तन स्कंध एस.पी.ई. में जोड़ा गया, जिसे आयात तथा निर्यात नियंत्रण अधिनियम के तहत अपराधों की जांच का कार्य सौंपा गया। जैसे-जैसे समय बीतता गया, अन्य कानूनों के तहत जो भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम और आयात तथा निर्यात नियंत्रण अधिनियम के उल्लंघन से संबंधित थे, एस.पी.ई. के तहत लाए गए। वास्तव में, 1963 तक एस.पी.ई. को भारतीय दंड संहिता की विभिन्न 91 धाराओं के तहत और 16 अन्य केंद्रीय अधिनियमों और साथ-साथ भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम, 1947 के तहत जांच करने के लिए प्राधिकृत किया गया।
  6. Central Bureau of Investigation एक बढ़ती हुई जरूरत को महसूस करते हुए एक केंद्रीय पुलिस एजेंसी की जरूरत महसूस की गई जो केंद्रीय सरकार के अधिकार क्षेत्र में हो जो न केवल रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार के मामलों की जांच करे, अपितु केंद्रीय राजकोषीय घाटा नियम, बड़े धोखाधड़ी के मामले जो केंद्रीय सरकार के विभागों, लोक संयुक्त स्टॉक कंपनियों, पासपोर्ट, समुद्री अपराध, एयरलाइन्स से संबंधित और संगठित गैंग तथा पेशेवर अपराधियों द्वारा किए गए अपराधों की जांच कर सके। इसलिए भारत सरकार ने 1 अप्रैल, 1963 को एक संकल्प पारित कर निम्नलिखित प्रभागों के साथ केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो का गठन किया।
    (1) अन्वेषण तथा भ्रष्टाचार निरोधक प्रभाग (डीएसपीई)
    (2) तकनीकी प्रभाग
    (3) अपराध अभिलेख और सांख्यिकी प्रभाग
    (4) अनुसंधान प्रभाग
    (5) विधि तथा सामान्य प्रभाग
    (6) प्रशासन प्रभाग
  7. अन्वेषण तथा भ्रष्टाचार निरोधक प्रभाग (डीएसपीई) का कार्य डीएसपीई अधिनियम, 1946 से इसके अधिकार और शक्तियां लेकर लगातार संकल्प में शासनादेश दिया गया है।
    ऐसे मामले जिसमें सरकारी कर्मचारी जो केंद्र सरकार के अधीन है वे स्वयं या राज्य सरकार के कर्मचारी और या अन्य व्यक्तियों के साथ लिप्त होना है।
    ऐसे मामले जिसमें केन्द्रीय सरकार के हितों या किसी सरकारी क्षेत्र की परियोजना या उपक्रम या कोई अन्य संवैधानिक निगम या कोई अन्य स्थापित निकाय और केंद्रीय सरकार द्वारा वित्त पोषित में लिप्त हो।
    ऐसे मामले जो भारत सरकार से विशेषकर जिनका उदाहरण नीचे दिया गया है, से संबंधित हो, की प्रवर्तन के साथ केंद्रीय नियमों को भंग करने से संबंधित।
    (क) आयात तथा निर्यात नियंत्रण आदेशों को भंग करना
    (ख) विदेशी मुद्रा नियमन अधिनियम का गंभीर उल्लंघन
    (ग) पासपोर्ट धोखाधड़ी
    (घ) केन्द्रीय सरकार के कार्यों से संबंधित कार्यालय गुप्त अधिनियम के तहत मामले
    (ङ) भारत का सुरक्षा अधिनियम या वे नियम जो केंद्रीय सरकार के विशेष रूप से संबंधितों के तहत कुछ एक विशेष श्रेणी के मामले।




रेलवे या डाक तथा टेलीग्राफ विभाग विशेषकर जो पेशेवर अपराधियों द्वारा अनेक राज्यों में चलाए जा रहे हों, से संबंधित धोखाधड़ी या छल कपट के गंभीर मामले।
(क) समुद्री अपराध
(ख) एयरलाइन्स में अपराध





संघ शासित क्षेत्रों विशेष रुप से जो पेशेवर अपराधियों द्वारा किए जाते हो, में गंभीर तथा महत्वपूर्ण प्रकृति के मामले।
पब्लिक ज्वांइट स्टॉक कंपनियों से संबंधित धोखाधड़ी, छल कपट और गबन के गंभीर मामले।
गंभीर प्रकृति के अन्य मामले जो किसी संगठित समूह या पेशेवर अपराधियों या संघ शासित राज्यों सहित विभिन्न राज्यों में शाखा बनाकर (रेमिफिकेशन) अपराध से संबंधित मामले, अवैध ड्रग के गंभीर मामले, पेशेवर अंतर्राज्य गैंग द्वारा बच्चों के अपहरण के महत्वपूर्ण मामले, इत्यादि। ये सभी मामले संबंधित राज्य सरकार/संघ शासित प्रशासन की सहमति से या अनुरोध पर लिए जाएंगे।
लोक सेवाओं और परियोजनाओं तथा सरकारी क्षेत्र के उपक्रमों में भ्रष्टाचार से संबंधित आसूचना प्राप्त करना।
इस प्रभाग द्वारा जांच किए गए मामलों का अभियोजन करना।
इस प्रभाग की सिफारिश के आधार पर आरंभ की गई विभागीय कार्यवाई में जांच अधिकारी के समक्ष मामले प्रस्तुत करना।





  1. भारत सरकार के दिनांक 29.02.1964 के संकल्प द्वारा आर्थिक अपराधों को जोड़कर सीबीआई को और ज्यादा मजबूत बनाया गया है। इस समय सीबीआई के पास दो अन्वेषण विंग है, एक को सामान्य अपराध विंग कहा जाना है जो केन्द्रीय सरकार/सरकारी क्षेत्र के उपक्रमों के कर्मचारियों के रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार के मामलों को देखता है और दूसरा आर्थिक अपराध विंग है जो राजकोषीय नियमों के उल्लंघन के मामलों को देखता है।
  2. सितंबर, 1964 में जमाखोरी, कालाबाजारी, खाद्यानों में मुनाफाखोरी से संबंधित जानकारी इकट्ठा करने से संबंधित खाद्यान अपराध विंग बनाया गया और यह ऐसे मामले भी लेता है जो उस समय मौजूदा स्थिति को ध्यान में रखते हुए अंतर्राज्य शाखा बनाने से संबंधित मामले। इसे 1968 में आर्थिक अपराध विंग में मिला दिया गया।
  3. जैसे-जैसे समय बीतता गया केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो से अलग-अलग जगहों से अनुरोध आए कि वे परंपरागत प्रकृति के मामलों जैसे हत्याएं, अपहरण, हाईजैकिंग, आतंकवादियों द्वारा किए गए अपराध, कार्यालय गुप्त अधिनियम का उल्लंघन, बड़े स्तर पर बैंकों और बीमा धोखाधड़ियों और अन्य विशेष मामलों जैसे कि भागलपुर अंधाकरण, भोपाल के गैस दुर्घटना इत्यादि जैसे मामलों की जांच करना। 1980 के आरंभ में संवैधानिक अदालतों ने सीबीआई के पास अन्वेषण/जांच के लिए मामले भेजने आरंभ कर दिए। यह है- कत्ल, दहेज हत्या, बलात्कार इत्यादि के मामलों में पीड़ित लोगों द्वारा आवेदन दर्ज करने से संबंधित रहते हैं। इनमें हुई प्रगतियों के आधार पर 1987 में यह निर्णय लिया गया कि के.अ.ब्यूरो में दो जांच प्रभागों अर्थात् भ्रष्टाचार निरोधक प्रभाग और विशेष अपराध प्रभाग का गठन किया जाए जिसमें दूसरा प्रभाग आर्थिक अपराधों के साथ-साथ परंपरागत अपराधों की जांच भी करेगा।
  4. विशेष अपराध प्रभाग के स्थापना होने पर भी विशेष सेल स्थापित किया गया था जो परंपरागत प्रकृति के महत्वपूर्ण और संवेदनात्मक मामलों की जांच करें। उदारहण के लिए, 1991 में श्री राजीव गांधी की हत्या की जांच करने के लिए विशेष जांच टीम (एस.आई.टी.) का गठन किया गया था, 1992 में अयोध्या में बाबरी मस्जिद के गिराने के मामले से संबंधित जांच के लिए विशेष जांच सेल-iv का गठन तथा 1993 में मुंबई बॉम्ब ब्लास्ट के मामले की जांच के लिए विशेष टास्क फोर्स का गठन किया गया था। बैंक घोटाला और प्रतिभूति से संबंधित मामलों की जांच करने के लिए 1992 में बैंक घोटाला और प्रतिभूति सेल गठित की गई थी।
  5. कुछ समयावधि पर, कुछ मामले जो मूल रूप से के.अ.ब्यूरो को सौंपा गया था, दूसरे संगठनों को हस्तांतरित किया गया था। अपराध रिकार्डों और सांख्यिकी की प्रभाग से संबंधित कार्य एनसीआरबी को हस्तांतरित कर दिया था और अनुसंधान प्रभाग से संबंधित कार्य बीपीआरएंडडी को हस्तांतरित कर दिया था।
  6. प्रतिभूति घोटाले से संबंधित मामलों और आर्थिक अपराधों में वृद्धि होने से संबंधित कार्य की अधिकता के कारण और भारतीय अर्थ-व्यवस्था के उदारीकरण के फलस्वरूप एक अलग से अपराध विंग 1994 में स्थापित किया गया था और यह सीबीआई की पुर्नगठन योजना के अनुमोदन के फलस्वरूप हुआ। परिणामस्वरूप के.अ.ब्यूरो में नए प्रभागों का गठन हुआ था।




(क) भ्रष्टाचार-निरोधक प्रभाग – केंद्रीय सरकारी कर्मचारियों, केंद्रीय पब्लिक उपक्रमों और केंद्रीय वित्तीय संस्थानों से जुड़े भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी से संबंधित मामलों की जांच करने के लिए।
(ख) आर्थिक अपराध प्रभाग – बैंक धोखाधड़ी, वित्तीय धोखाधड़ी, आयात-निर्यात और विदेशी मुद्रा अतिक्रमण, नारकोटिक्स, पुरातन वस्तुएं, सांस्कृतिक संपत्ति की बढ़ती तस्करी और विनिषिद्ध वस्तुओं आदि की तस्करी से संबंधित।
(ग) विशेष अपराध प्रभाग – आतंकवाद, बोम्ब ब्लास्ट, संवेदनात्मक मानव वध, मुक्ति-धन के लिए अपहरण और माफिया और अंडर-वर्ल्ड द्वारा किए गए अपराधों से संबंधित।
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  1. विनीत नारायण और अन्य बनाम संघ सरकार मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय के दिशानुसार जुलाई, 2001 में मौजूदा विधि प्रभाग को पुर्नगठित कर अभियोजन निदेशालय बनाया गया। आज की दिनांक के अनुसार, के.अ.ब्यूरो के निम्नलिखित प्रभाग हैं :-
  2. भ्रष्टाचार निरोधक प्रभाग
  3. आर्थिक अपराध प्रभाग
  4. विशेष अपराध प्रभाग
  5. अभियोजन निदेशालय
  6. प्रशासन प्रभाग
  7. नीति और समन्वय प्रभाग
  8. केंद्रीय आपराधिक विज्ञान प्रयोगशाला
  9. वर्षों के बाद, केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो देश की एक प्रमुख जांच एजेंसी के रूप में ऊभरकर सामने आई है जिसमें आम जन-मानस, संसद, न्यायपालिका और सरकार का विश्वास है। पिछले 65 सालों में, यह संगठन एक भ्रष्टाचार निरोधक एजेंसी से हटकर एक बहु-आयामी, बहु-अनुशासनात्मक केंद्रीय पुलिस, क्षमता, विश्वसनीयता और विधि शासनादेश का पालन करते हुए जांच कर एक विधि प्रवर्तन एजेंसी बनी और यह भारत में कहीं भी अपराधों का अभियोजन करती है। आज की तारीख के अनुसार, 69 केंद्रीय और 18 राज्य अधिनियम के तहत अपराध और भारतीय दंड संहिता के तहत 231 अपराधों को केंद्रीय सरकार ने डीपीएसई अधिनियम की धारा 3 के तहत अधिसूचित किया गया।
  10. निदेशक, केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो, पुलिस उपमहानिरीक्षक के रूप में दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना के संगठन के प्रशासन के प्रति उत्तरदायी है। केन्द्रीय सतर्कता आयोग अधिनियम, 2003 के लागू हो जाने से दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना का अधीक्षण भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम, 1988 के तहत अपराधों के अन्वेषण को छोड़कर सरकार के हाथ में है जिसमें अधीक्षण केन्द्रीय सतर्कता आयोग के पास है। निदेशक, केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो को सीवीसी अधिनियम, 2003 के तहत सीबीआई में दो वर्ष का कार्यकाल की सुरक्षा प्रदान की गई है। सीवीसी अधिनियम में यह भी व्यवस्था की गई है कि सीबीआई में पुलिस अधीक्षक तथा उससे ऊपर के रैंक के अन्य अधिकारियों और निदेशक सीबीआई के चयन के लिए एक तंत्र मुहैया किया गया है।








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