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हरितालिका व्रत कथा | haritalika vrat katha 2020 |Teej 2020

शुक्रवार, 21 अगस्त 2020 | अगस्त 21, 2020 WIB Last Updated 2021-04-01T09:33:12Z
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haritalika vrat katha 2020 :- भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया ( Teej 2020) को हरतालिका तीज का व्रत किया जाता है । इस दिन शंकर-पार्वती जी की बालू की मूर्ति बनाकर पूजन किया जाता है । haritalika Teej व्रत को कुंआरी कन्याएं तथा सौभाग्यवती स्त्रियां ही करती हैं । इसमें सुंदर वस्त्रों, कदली स्तंभों से गृह को सजाकर नाना प्रकार के मंगल गीतों से रात्रि जागरण किया जाता है । इस व्रत को करने वाली स्त्रियां पार्वती के समान सुखपूर्वक पति रमण करके शिवलोक को प्रस्थान करती हैं ।





हरितालिका पूजन विधि | haritalika pujan vidhi





haritalika vrat pujan vidhi :- भगवान शंकर माता पार्वती गणेश जी कलश का पूजन विधि विधान से करे पूजन का क्रम है - पाद्य , अर्घ , स्नान, वस्त्र, उपवस्त्र, गंध, अक्षत (चन्दन, चावल आदि ) पुष्प, धूप, दीप, प्रशाद ( फल फूल, मिठाई आदि ) पान, सुपारी, नारियल, लोंग, आदि चढ़ाय फिर भगवान् को दृव्य दक्षिना (सुवर्ण, दान रूपये, आदि ) चढ़ाकर भगवान् से क्षमा याचना करे अंत में भगवान् को अर्घ देवे इस क्रम से हरितालिका व्रत का पूजन करे .





हरितालिका व्रत कथा | haritalika vrat katha 2020 |Teej 2020





श्री गणेशाय नमः सूतजी कहते हैं कि मन्दार की माला से जिन (पार्वतीजी) का केशपाश अलंकृत है और मुंडो की माला से जिन ( शिवजी ) की जटा अलंकृत है, जो ( पार्वतीजी ) दिव्य वस्त्र धारण की हैं और जो ( शिवजी ) दिगम्बर है ऐसे श्री पार्वतीजी तथा शिवजी को प्रणाम करता हूँ ॥ रमणीक कैलास पर्वत के शिखर पर बैठी हुई श्री पार्वती जी कहती हैं-हे महेश्वर ! हमें कोई गुप्त व्रत या पूजन बताइये ॥ जो सब धर्मों में सरल हो जिसमें परिश्रम भी कम करना पड़े, लेकिन फल अधिक मिले । हे नाथ ! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हो तो वह विधान बताइये ॥ हे प्रभो ! किस तप, व्रत या दान से आदि, मध्य और अन्त रहित आप जैसे महा प्रभु हमको प्राप्त हुए हैं ।।





शिवजी बोले हे देवि ! सुनो, मैं तुमको एक उत्तम व्रत जो मेरा सर्वस्व और छिपाने योग्य है लेकिन तुम्हारे प्रेम से वशीभूत होकर मैं तुम्हें बतलाता हूँ ॥ जैसे नक्षत्रों में चन्द्रमा, ग्रहों में सूर्य, वर्गों में ब्राह्मण, देवताओं में विष्णु भगवान् ॥ नदियों में गंगा, पुराणों में महाभारत, वेदों में सामवेद और इन्द्रियों में मन श्रेष्ठ है ॥ सब पुराण और स्मृतियों में जिस तरह कहा गया है, में तुम्हें एक प्राचीन व्रत बतलाता हूँ । तुम एकाग्र मन से सुनो ॥ जिस व्रत के प्रभाव से तुमने मेरा आधा आसन प्राप्त किया है, वह मैं तुमको बताऊंगा । क्योंकि तुम मेरी प्रेयसी हो ॥ भाद्रपद मास में हस्त नक्षत्र संयुक्त शुक्ल तृतीया तिथि (haritalika Teej) को उसका अनुष्ठान मंत्र करने से स्त्रियां सब पापों से मुक्त हो जाती हैं ॥ हे देवि ! तुमने आज से बहुत दिनों पहले हिमालय पर्वत पर इस व्रत को किया था वह वृत्तान्त मैं तुमसे कहूँगा ॥





पार्वती ने पूछा है नाथ ! मैंने क्यों यह व्रत किया था यह सब आपके मुख से सुनना चाहती हूं ॥ शिवजी कहते. हैं कि भारत वर्ष के उत्तर की ओर एक बड़ा रमणीक और पर्वतों में श्रेष्ठ हिमवान् नामक पर्वत है । उसके आस-पास तरह-तरह की भूमियाँ हैं तरह-तरह के वृक्ष उन पर लगे हुए हैं ॥ नाना प्रकार के पक्षी और अनेक प्रकार के पशु उस पर निवास करते हैं । वहाँ पहुँच कर गन्धर्वों के साथ बहुत-से देवता, सिद्ध, चारण और पक्षीगण सर्वदा प्रसन्न मन से विचरते हैं । वहाँ पहुँच कर गन्धर्व गाते हैं अप्सरायें नाचती हैं । उस पर्वतराज के कितने ही शिखर ऐसे हैं कि जिनमें स्फटिक, रत्न और बैदूर्यमणि आदि की खाने भरी हैं ।। यह पर्वत ऊँचा तो इतना अधिक है कि मित्र के घर की तरह समझ कर आकाश को स्पर्श किये रहता है । उसके समस्त शिखर सदैव हिम से आच्छादित रहते हैं और गङ्गा की जल धुनि सदा सुनाई देती रहती है ॥





हरितालिका व्रत कथा | haritalika vrat katha 2020 |Teej 2020





है पार्वती तुमने बाल्यकाल में उसी पर्वत पर तपस्या की थी । बारह वर्ष तक तुम उलटी टँगकर केवल घुँआ पीकर रही ॥ चौसठ वर्ष तक सूखे पत्ते खाकर रही । माघ मास में तुम जल में बैठी रहती और वैशाख की दुपहरिया में पंचाग्नि तापती थी ॥ श्रावण के महीने में जल बरसता रहता तो तुम भूखी-प्यासी रइकर मैदान में बैठी रहती थी । तुम्हारे पिता इस तरह के कष्ट सहन को देखकर बढ़़े दुःखी हुए ॥ वे चिन्ता में पड़ गये कि मैं अपनी कन्या किसको दूँ, उसी समय नारद जी वहाँ आ पहुँचे ॥ मुनिश्रेष्ठ नारदजी उस समय तुम्हें देखने को आये थे । नारद को देखकर गिरिने आध्य-पाद्य आसन आदि देकर उनकी पूजा की और कहा- हे स्वामिन् आप किस लिए आये हैं ? मेरा अहो भाग्य है आपका आगमन मेरे लिए अच्छा है ॥ नारदजी ने कहा है पर्वतराज सुनो विष्णु भगवान का भेजा हुआ मैं आपके पास आया हूँ । आपको चाहिए कि यह कन्या रत्न किसी. योग्य वर को दे ॥ भगवान विष्णु के समान योग्य वर ब्रह्मा, इन्द्र और शिव इनमें से कोई नहीं हैं । इसलिये मैं यही कहूँगा कि आप अपनी कन्या भगवान् विष्णु को ही देवें ॥





हिमबान् ने कहा भगवान् विष्णु स्वयं मेरी कन्या ले रहे हैं और आप यह सन्देश लेकर आये हैं तो मैं उन्हें अपनी कन्या दूँगा ॥ हिमवान् की इतनी बात सुनकर मुनिराज नारद आकाश में विलीन हो गये । वे पीताम्बर, शंख, चक्र और गदाधारी भगवान विष्णु के पास पहुँचे ।। वहाँ हाथ जोड़कर नारद जी ने भगवान विष्णु से कहा-हे देव ! सुनिये मैंने आपका विवाह पक्का कर दिया ॥ उधर हिमवान् ने पार्वती के पास जाकर कहा कि हे पुत्री ! मैंने तुम्हें भगवान् विष्णु को दे डाला ॥ तब पिता की बात सुनकर तुम बिना उत्तर दिये ही अपनी सखी के घर चली गयीं । बहीं जमीन पर पड़कर तुम बड़ी दुःखी होती हुई विलाप करने लगी ॥ तुमको इस तरह बिलाप करते देख एक सखी ने पास आकर कहा-देवि ! तुम क्यों इतनी दुःखी हो मुझको इसका कारण बताओ ॥ तुम्हारी जो कुछ इच्छा होगी में यथा शक्ति उसको पूरी करने की चेष्टा करूंगी । इसमें कोई संशय नहीं ।





पार्वती बोली-मेरी जो कुछ अभिलाषा है उसे तुम प्रेमपूर्वक सुनो-मैं एकमात्र शिवजी को अपना पति बनाना चाहती हूँ, इसमें कुछ भी संशय नहीं है । मेरे इस. विचार को पिता जी ने ठुकरा दिया है ॥ इससे मैं अपने शरीर को त्याग दूँगी । पार्वती की इस बात को सुनकर सखियों ने कहा ॥ कि शरीर का त्याग न कर, चलो किसी ऐसे वन को चले जहाँ पिता जी को तुम्हारा पता न लगे । ऐसी सलाह कर तुम वन में जा पहुँची । उघर तुम्हारे पिता घर-घर तुम्हें खोजने लगे । दूतो द्वारा भी खबर लेने लगे कि कौन देवता-दानव या किन्नर मेरी पुत्री को हर ले गया है। ।। उन्होंने मन ही मन कहा-में नारद जी के आगे प्रतिज्ञा कर चुका हूँ कि अपनी पुत्री भगवान् विष्णु को दूंगा । ऐसा सोचते-सोचते हिमवान् मूर्छित हो गये ॥ गिरिराज को मूर्छित देखकर सब लोग हाहा कार करते दौड़ पड़े, जब होश हुआ तो सब पूछने लगे कि गिरिराज ! आप अपनी मूर्छा का कारण बताइये ॥ हिमवान् ने कहा आप लोग मेरे दुख का कारण सुने । न मालूम कौन मेरी कन्या को हर ले गया है । ऐसा नहीं हुआ तो उसे किसी काले. सौंप ने काट लिया होगा या सिंह बाघ खा गये होंगे ! मेरी बेटी कहाँ गयी । किस दुष्ट ने मेरी पुत्री को मार डाला । ऐसा कह कर वे वायु झोको से कापते हुए वृक्ष के समान कापने लगे ।





इसके बाद हिमवान तुमको वन-वन खोजने लगे । वह वन भी सिंह, भालू, आादि हिंसक जंतु से बड़ा भयानक हो रहा था । तुम भी अपनी सखी के साथ उस भयानक वन में चलती-चलती एक ऐसे जगह जा पहुंची जहाँ एक नदी बह रही थी उसके रमणीय तट पर एक बड़ी-सी कन्दरा थी ॥ तुमने उसी कन्दरा में आश्रय लिया और मेरी एक बालुकामयी प्रतिमा बनाकर अपनी सखी के साथ निराहार रहकर मेरी आराधना करने लगी । जब भाद्र शुक्ल पक्ष की हस्तयुक्त तृतीया तिथि प्राप्त हुई तब तुमने मेरा विधिवत् पूजन किया और रात भर जाग कर गीत-वद्यादि से मुझे प्रसन्न करने में बिताया उस व्रतराज के प्रभाव से मेरा आसन डगमगा उठा । जिससे मैं तत्काल उस स्थान पर जा पहुँचा जहाँ कि तुम अपनी सखियो के साथ रहती थी ॥





वहाँ पहुँचकर मैंने तुमसे कहा कि मैं तुम पर प्रसन्न हूँ बोलो क्या चाहती हो ? तुमने कहा-मेरे देवता यदि आप मेरे ऊपर प्रसन्न है तो मेरे पति बनें । मेने 'तथास्तु कह कर कैलास पर्वत पर वापस आने पर तुमने वह प्रतिमा नदी में प्रवाहित कर दी ।। और सखी के साथ उस महाव्रत का पारण किया । हिमवान् भी तब तक उस वन में तुम्हें खोजते आ पहुँचे ॥ चारों दिशाओं में तुम्हारी खोज करते-करते वे व्याकुल हो चुके थे । इसलिए तुम्हारे आश्रम के समीप पहुँचते ही गिर पड़े । थोड़ी देर बाद उन्होंने नदी के तट पर दो कन्यायें देखीं ॥ देखते ही उन्होंने तुम्हें छाती से लगा लिया और विलख कर रोने लगे । फिर पूछा पुत्री ! तुम सिंह, व्याघ्र आदि जन्तुओं से भरे इस वन में क्यो आ पहुँची ॥





पार्वती जी ने उत्तर दिया-हे पिताजी । मैंने पहले ही अपने आपको शिवजी के हाथों सौंप दिया था। आपने मेरी बात टाल दी ? इससे मैं यहाँ चली आयी ॥ हिमवान् ने सान्त्वना दिया कि हे पुत्री ! मैं तुम्हारी इच्छा के विरुद्ध कुछ न करुँगा तुम्हें अपने साथ ले घर आये और मेरे साथ तुम्हारा विवाह कर दिये । इसी से तुमने मेरा अर्धासन पाया है । तबसे लेकर आज तक किसी के सामने यह व्रत प्रकट करने का अवसर नहीं प्राप्त हुआ ।





हे देवि ! मैं यह बताता हूँ कि इस व्रत का हरितालिका नाम क्यों पड़ा, तुमको सखियाँ हर ले गयी थीं इसी से हरितालिका नाम पड़ा । पर पार्वती जी ने कहा-हे प्रभो आपने नाम तो बता अब विधि भी बतायें । इसका क्या पुण्य है, क्या फल है, यह व्रत कौन करे ? ॥ श्री शिवजी पार्वतीजी से कहते हैं—हे देवि ! मैं स्त्री जाति की भलाई के लिए यह उत्तम व्रत बतलाता हूँ जो स्त्री अपने सौभाग्य की रक्षा करना चाहती हो वह यत्नपूर्वक इस व्रत को करे ॥ पहले कदली के खम्भे आदि से सुशोभित एक सुन्दर मण्डप बनावे उसमें रंग-रंग के रेशमी कपड़ों के चँदवा लगाकर चन्दन आदि सुगन्धित द्रव्यों से वह मंडप लिपावे फिर शंख मेरी मृदंग आदि बजाते हुए बहुत-से लोग एकत्रित होकर तरह-तरह के मंगलाचार करते हुए उस मण्डप में पार्वती तथा शिवजी की प्रतिमा स्थापित करें ॥





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उस रोज दिन भर उपवास कर बहुत-से सुगन्धित फूल गन्ध और मनोहर धूप, नाना प्रकार के नैवेद्य आदि एकत्र कर मेरी पूजा करे और रात भर जागरण करे ॥ ऊपर जो वस्तुएँ गिनाई गयी हैं उनके सिवाय नारियल सुपारी,
जंबीरी नीबू, लौंग, अनार, नारंगी आदि जो-जो फल प्राप्त हो सके, उन्हें इकट्ठा कर ले ॥ उस ऋतु में जो फल तथा फूल मिल सके उन्हें विशेष करके रक्खे, फिर, धूप, दीपादि के द्वारा निम्नलिखित मन्त्रों का उच्चारण करता हुआ पूजन करे ।। इसके बाद "शिवायै शिवरूपपिण्यै" यहाँ से लेकर "प्रसन्ना भव पार्वती" तक के. मन्त्रों का उच्चारण करें इसका अर्थ व प्रकार है- है शिव ! शिवरूपिणि, हे मंगले! सव अर्थो को देने वाली है देवि ! हे शिव रूपी आपको नमस्कार ॥ है शिवरुपे ! आपको नमस्कार है हे शिवे ! आपको सदा के लिए नमस्कार है, हे ब्रह्म रूपिणी ! आपको नमस्कार है. हे जगद्धात्री ! आपको नमस्कार है । हे सिंहवाहिनी ! संसार के भय से भयभीत मुझ दीन की रक्षा करो ।





इस कामना की पूर्ति के लिये मैंने आपकी पूजा की है ॥ हे पार्वती ! मुझे राज्य और शौभाग्य दो, मुझ पर प्रसन्न हो । इन्हीं मन्त्रों से पार्वती तथा शिवजी की पूजा करे ॥ तदनन्तर विधि पूर्वक कथा सुने और ब्राह्मण को वस्त्र, गौ, सुवर्ण आदि देवे ॥ इस तरह एक चित्त होकर स्त्री-पुरुष दोनों एक साथ पूजन करें । फिर वस्त्र आदि जो कुछ हो उसका संकल्प करें ॥ हे देवि ! जो स्त्री इस प्रकार पूजा करती है वह सब पापों से छूट जाती है और उसे सात जन्म तक सुख तथा सौभगय प्राप्त होता है ॥





जो स्त्री तृतीया तिथि का व्रत न कर अन्न भक्षण करती है तो वह सात जन्म तक बन्ध्या रहती है और उसको बार-बार विधवा होना पड़ता है ॥ वह सदा दरिद्री, पुत्र-शोक से शोकाकुल स्वभाव की लड़ाकी, सदा दुःख भोगने वाली होती है और उपवास न करनेवाली स्त्री अन्त में घोर नरक में जाती है ॥ तीज को अन्न खाने से खीरी, फल खाने से बँदरियाँ, पानी पीने से जोक, दूध से साँपिन, मांसाहार करने से बाधिन, दही से बिल्ली, मिठाई खाने से चींटी और सब खाने से मक्खी होती है । उस रोज सोने से अजगरी और पति को धोखा देने से मुर्गी होती है, इसलिए हर स्त्रियाँ व्रत अवश्य करें ॥





दूसरे दिन सुवर्ण चाँदी, तावाँ. तथा बाँस के पात्र में अन्न भर कर ब्राह्मण को दान दे और पारण करे ॥ जो स्त्री इस प्रकार व्रत करती है वह मेरे सामान पति पाती है और जब वह मरने लगती है तो तुम्हारे समान उसका रूप हो जाता है । उसे सब प्रकार के सांसारिक भोग और सामीप्य मुक्ति भी मिल जाती है ॥





हरितालिका व्रत कथा महत्व | haritalika vrat katha mahatw





इस हरितालिका की व्रत कथा मात्र सुन लेने से प्राणी को एक हजार अश्वमेध और सैकड़ों बाजपेय यज्ञ करने का फल प्राप्त होता है ॥ हे देवि ! मैंने यह सब व्रतों में उत्तम व्रत बतलाया जिसके करने से प्राणी सब पापों से छूट जाता है इसमें कुछ भी संशय नहीं है ।।





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हरितालिका व्रत कथा | haritalika vrat katha 2020 |Teej 2020





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