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जाने अधिकतर किन मामलों लिए जाने जाते हैं प्रशांत भूषण:

शनिवार, 15 अगस्त 2020 | अगस्त 15, 2020 WIB Last Updated 2021-04-01T09:33:02Z
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जाने माने वकील और सामाजिक कार्यकर्ता प्रशांत भूषण को सुप्रीम कोर्ट की आवमानना के एक मामले में दोषी ठहराया गया है. इस मामले में उनको 20 अगस्त को सजा सुनाई जाएगी.
प्रशांत भूषण ने मुख्य न्यायधीश और चार अन्य पूर्व मुख्य न्यायधीशों को लेकर ट्वीट किए थे. इसी मामले में यह फ़ैसला आया है.
जस्टिस अरुण मिश्र की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की इस बेंच ने कहा कि यह अवमानना का गंभीर मामला है. इस बेंच में जस्टिस अरुण मिश्र के अलावा जस्टिस बीआर गावी और जस्टिस कृष्णा मुरारी थे. हालांकि यह फ़ैसला वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग के ज़रिए सुनाया गया.
कंटेम्ट ऑफ़ कोर्ट्स ऐक्ट, 1971 के तहत इस मामले में प्रशांत भूषण को अधिकतम छह माह तक की सजा हो सकती है या फिर दो हज़ार रूपये का जुर्माना लगाया जा सकता है या फिर दोनों सजा सुनाई जा सकती है.





इसी क़ानून में ये भी प्रावधान है कि अभियुक्त के माफ़ी मांगने पर अदालत चाहे तो उसे माफ़ कर सकती है.





इसी साल 22 जुलाई को भी सुप्रीम कोर्ट ने प्रशांत भूषण के दो विवादित ट्वीट्स पर ख़ुद से संज्ञान लेते हुए उन्हें नोटिस जारी किया था. अदालत का कहना था कि शुरुआती तौर पर प्रशांत भूषण के इन ट्वीट्स से न्याय व्यवस्था का अपमान होता है.





हालांकि प्रशांत भूषण की ओर से दलील दे रहे वकील दुष्यंत दवे ने अदालत में साबित करने की कोशिश की कि प्रशांत भूषण के दो ट्वीट संस्था के तौर पर सुप्रीम कोर्ट की अवमानना नहीं करते.





पिछले दिन जिन मामलों को लेकर प्रशांत भूषण चर्चा में रहे हैं, उनमें प्रमुख निम्नांकित हैं-





पीएम केयर्स फंड पर सवाल





सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन (सीपीआईएल) की ओर से प्रशांत भूषण ने जनहित याचिक दाख़िल करके कोविड-19 महामारी का मुक़ाबला करने में राहत कार्यों के लिए पीएम केयर्स फंड से एनडीआरएफ को फंड ट्रांसफर करने की मांग की थी.





इस याचिका में यह भी कहा गया था कि राष्ट्रीय आपदा राहत कोष (एनडीआरएफ) का उपयोग अधिकारियों द्वारा स्वास्थ्य संकट के बावजूद नहीं किया जा रहा है और पीएम केयर्स फंड आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के दायरे से बाहर है. इस याचिका में पीएम केयर्स फंड के संबंध में पारदर्शिता की कमी के मुद्दे को उठाया गया था और यह भी कहा गया था कि यह कैग ऑडिट के अधीन नहीं है.





इसके जवाब देते हुए केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि पीएम केयर्स फंड के बनाने पर कोई रोक नहीं है क्योंकि यह राष्ट्रीय आपदा राहत कोष से स्वतंत्र और अलग है जो आपदा प्रबंधन अधिनियम के तहत निर्धारित है.





इस सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सराकरों के लिए कई निर्देश दिए जिससे लोगों के घर लौटने में मदद मिली. हालांकि 27 जुलाई, 2020 को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अपना फ़ैसला सुरक्षित रख लिया.





लॉकडाउन में फंसे मजदूरों के हक की मांग
प्रशांत भूषण के माध्यम से लॉकडाउन के दौरान यह याचिका अप्रैल, 2020 के दौरान दाख़िल की गई जिसमें कहा गया था कि प्रवासी मज़दूर, लॉकडाउन के कारण सबसे ज़्यादा प्रभावित तबका है.





जब महानगरों से सैकड़ों किलोमीटर दूर अपने घरों की ओर पैदल जाने को मजबूर थे तब याचिका में मांग की गई थी कि देश भर में फंसे लाखों प्रवासी मजदूरों को उनके घरों तक सुरक्षित भेजने की मांग की गई थी.





इस याचिका के जवाब में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि सरकार वास्तव में प्रत्येक नागरिक के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए अपने स्तर पर अच्छा कर रही है. इतना ही नहीं, सॉलिसिटर जनरल ने आगे कहा कि श्री भूषण एक मात्र ही नहीं हैं, जिन्हें देश में लोगों के अधिकारों के बारे में चिंता है.





जनरल तुषार मेहता ने इस सुनवाई में प्रशांत भूषण पर निशाना साधते हुए यह भी कहा कि आप पीआईएल दाखिल करने के अलावा मजदूरों की मदद नहीं कर सकते.





रफ़ाल मामले में पुनर्विचार याचिकाएं





सुप्रीम कोर्ट में प्रशांत भूषण, यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी ने भारत सरकार की ओर से फ्रांसीसी कंपनी डैसो एविएशन से 36 रफ़ाल जट खरीदने के सौदे में भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच को फिर से करने के लिए पुनर्विचार याचिका दाखिल की थी.





लेकिन तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई, जस्टिस एसके कौल और केएम जोसेफ की पीठ ने 14 नंवबर, 2019 को इनकी पुनर्विचार याचिकाओं को सुनवाई के योग्य नहीं माना था.





आरटीआई को कमजोर करने की कोशिश





केंद्र और राज्य सूचना आयोगों में सचूना आयुक्तों के रिक्त पदों को भरने के लिए याचिका तो वैसे अंजलि भारद्वाज की थी लेकिन भारद्वाज के वकील प्रशांत भूषण ही थे. इस मामले में तर्क देते हुए प्रशांत भूषण ने कहा था कि केवल जो भ्रष्ट हैं वो इस क़ानून से डरते हैं.तब मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एसए बोबड़े ने कहा ता कि हर कोई अवैध नहीं कर रहा है.





इसी बहस के दौरान भूषण ने दलील दी कि सरकार आरटीआई क़ानून नहीं चाहती है और इसे निरर्थक मनाने के प्रयास किए गए है. तब मुख्य न्यायाधीश बोबड़े ने उन्हें फटकार लगाते हुए कहा था कि हम चाहते हैं कि आप कानून के किसी भी दुरुपयोग को रोकने में मदद करें.





गुजरात के पूर्व गृह राज्य मंत्री हरेन पांड्या की हत्या की एसआईटी से जांच
गुजरात के पूर्व गृह राज्य मंत्री हरेन पांड्या की हत्या के मामले की अदालत की निगरानी में जांच की मांग वाली जनहित याचिका प्रशांत भूषण की संस्था सेंटर फॉर पब्लिक इंट्रेस्ट लिटीगेशन ने लगाई थी.





इस याचिका का विरोध करते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा था कि किसी आपराधिक मामले को लेकर जनहित याचिका दाखिल नहीं की जा सकती.





सीपीआईएल ने अपनी याचिका में कहा था कि इस हत्या कांड में नए सिरे से जांच की आवश्यकता है क्योंकि मामले में नई जानकारियां सामने आई हैं. याचिका में दावा किया गया था हरेन पांड्या की हत्या डीजी वंजारा के इशारे पर की.





गौरतलब है कि गुजरात में भाजपा सरकार के दौरान गृह राज्यमंत्री हरेन पांड्या की हत्या अहमदाबाद में 26 मार्च, 2003 को गोली मारकर कर दी गई थी. सीबीआई जांच के मुताबिक वर्ष 2002 में हुए सांप्रदायिक दंगे का बदला लेने के लिए पांड्या की हत्या की गई थी.





जस्टिस लोया की मौत की जांच की अपील





गुजरात के बहुचर्चित सोहराबुद्दीन शेख मामले की सुनवाई करने वाले जस्टिस लोया की दिसंबर, 2014 में नागपुर में मौत हो गई थी, जिसे संदिग्ध माना गया. जस्टिस लोया के बाद जिस जज ने इस मामले की सुनवाई की उन्होंने अमित शाह को मामले में बरी कर दिया था.





जस्टिस लोया की मौत की निष्पक्ष जांच को लेकर भी जनहित याचिकाएं दाखिल की गई थी, यह याचिकाएं कई लोगों की ओर से लगाई गईं लेकिन पैरवी करने वाले वकीलों में प्रशांत भूषण शामिल थे.





अप्रैल, 2018 में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली तीन जजों की कमेटी ने इस मामले में फिर से सुनवाई करने इनकार कर दिया था.





ये दरअसल कुछ ऐसे मामले हैं जिनसे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि प्रशांत भूषण का अब तक किन तरह के मामलों से साबका रहा है.





उनको लेकर यह दावा जरूर किया जा सकता है कि आप कोई भी कानूनी केस उठा लीजिए, जो सरकार के बेचैन करने वाली हो, परेशान करने वाली हो या फिर सवाल पूछने वाली हो, आप उस मामले में कहीं ना कहीं वकील प्रशांत भूषण का नाम दिख जाएगा.





2 जी स्पेक्ट्रम आवंटन पर सवाल






यह कोई नरेंद्र मोदी की सरकार के समय का सच नहीं है, बल्कि बीते चार दशक से प्रशांत भूषण यही करते आए हैं. यूपीए की मनमोहन सिंह सरकार के समय में प्रशांत भूषण ने 2 जी मोबाइल टेलीफोन स्पेक्ट्रम आवंटन मामले में जनहित याचिका दाख़िल किया था.





तब सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सीबीआई को जांच करने को कहा और तत्कालीन दूर संचार मंत्री ए राजा को ना केवल इस्तीफ़ा देना पड़ा बल्कि जेल भी जाना पड़ा. इस मामले में 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने स्पेक्ट्रम आवंटन को रद्द कर दिया था.





2012 में प्रशांत भूषण के कोल ब्लॉक आवंटन को लेकर भी जनहित याचिका दाखिल किया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि कुछ कंपनियों का राजनेताओं ने फेवर किया है, इसके बाद कोल ब्लॉक के आवंटन रद्द करने पड़े थे.





इसके बाद गोवा में अवैध लौह अयस्क खनन को लेकर भी प्रशांत भूषण की याचिका के बाद सुप्रीम कोर्ट ने गोवा में खनन पर रोक लगाई थी.





लेकिन प्रशांत भूषण की जनहित याचिकाओं की कोई भी सूची केंद्रीय सतर्कता आयुक्त पीजे थॉमस की नियुक्ति को चैलेंज करने वाली याचिका के बिना पूरी नहीं होगी. उनकी याचिका के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने पीजे थॉमस की नियुक्ति को मार्च, 2011 में अवैध ठहराया था.





इससे पहले 2009 में प्रशांत भूषण ने ही उस मामले की पैरवी की थी जिसके चलते सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायाधीशों को आरटीआई के दायर में लाया गया, अदालत की वेबसाइटों पर उन्हें अपना पद और अपनी संपत्ति की जानकारी देनी पड़ी.





2003 में प्रशांत भूषण ही उस मामले के वकील रहे जिसके चलते केंद्र सरकार हिंदुस्तान पेट्रोलियन और भारत पेट्रोलियम का निजीकरण के लिए संसद की मंजूरी को अनिवार्य बनाया गया था.





इससे पहले 1990 में प्रशांत भूषण भोपाल गैस कांड के मामले को सुप्रीम कोर्ट में फिर से शुरू कराकर पीड़ितों को मुआवजा दिलाने का काम कर चुके थे. हालांकि नर्मदा बचाओ आंदोलन में लंबी अदालती लड़ाई में उन्हें कामयाबी नहीं मिली थी.





देश की न्याय व्यवस्था में जवाबदेही तय करने की मुहिम प्रशांत भूषण अपने पिता और पूर्व केंद्रीय कानून मंत्री शांति भूषण के साथ चलाते रहे हैं.





प्रशांत भूषण मौत की सजा के पक्ष में नहीं हैं. यही वजह है कि उन्होंने 2008 के मुंबई हमले में शामिल अजमल कसाब को फांसी दिए जाने का विरोध किया था.





अपने पिता से प्रभावित होकर वकालत के पेशे में आए प्रशांत भूषण आईआईटी मद्रास में मैकनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने गए लेकिए एक ही सेमेस्टर में लौट आए. फिर इकॉनामिक्स और फिलॉसोफ़ी पढ़ने प्रिंसटन यूनिवर्सिटी गए लेकिन वहां भी पढ़ाई पूरी नहीं की. फिर वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय से लॉ ग्रेजुएट हुए.





अपने पहले ही केस, दून वैली मामले के जरिए उत्तराखंड़ में अवैध खनन पर रोक के साथ उन्होंने पर्यावरण, मानवाधिकार और पारदर्शी न्यायव्यवस्था की अपनी लड़ाई शुरू की थी.





प्रशांत भूषण का दावा है कि अब तक वे करीब 500 जनहित याचिकाओं की पैरवी कर चुके हैं, इसी दावे के मुताबिक वे अपना तीन चौथाई समय ऐसी याचिकाओं पर लगाते हैं. इतना ही नहीं जिस 25 प्रतिशत समय में पैसे लेकर मामले की पैरवी करते हैं, उसमें अपने समकक्षों की तुलना में मामूली फीस से काम चलाते हैं.





इस दौरान प्रशांत भूषण विभिन्न संस्थाओं से भी जुड़े रहे. सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लेटिगेशन (सीपीआईएल) के अलावा वे पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) के साथ साथ ट्रांसपरेंसी इंटरनेशनल से भी जुड़े रहे. वहीं न्यायिक सुधार के लिए कैंपेन फॉर ज्यूडिशिएल एकाउंटबिलिटी और ज्यूडिशिएल रिफॉर्म्स की वर्किंग कमेटी के संयोजक भी हैं.





वकील और सामाजिक कार्यकर्ता की अपनी भूमिका से अन्ना आंदोलन के समय में वे थोड़ा भटके और राजनीति में आ गए. 2012 में वे आम आदमी पार्टी की स्थापना करने वाले लोगों में रहे. हालांकि बाद में पार्टी ने उन्हें, योगेंद्र यादव के साथ बाहर का रास्ता दिखा दिया था.





हालांकि समय समय पर उनके बयानों को लेकर विवाद भी होते रहे हैं. चाहे वह जम्मू कश्मीर में सशस्त्र बलों के विशेषाधिकार को हटाने को लेकर उनका बयान रहा हो या फिर मौजूदा समय में उनके ट्वीट को लेकर हो रहा विवाद.


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