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दरियादिली की अपील नहीं करूंगा, किसी भी सज़ा को तैयार - प्रशांत भूषण

गुरुवार, 20 अगस्त 2020 | अगस्त 20, 2020 WIB Last Updated 2021-04-01T09:33:11Z
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सुप्रीम कोर्ट ने अवमानना मामले में दोषी ठहराए गए जाने-माने वकील प्रशांत भूषण की उस याचिका को खारिज कर दिया है जिसमें उन्होंने सज़ा पर सुनवाई टालने की अपील की थी.
प्रशांत भूषण को जस्टिस अरुण मिश्र की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की बेंच ने 14 अगस्त 2020 को आपराधिक अवमानना का दोषी ठहराया था.
प्रशांत भूषण ने बुधवार को इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में अर्ज़ी दाखिल कर, सज़ा पर सुनवाई टालने की अपील की थी. उन्होंने अपनी अर्ज़ी में कहा था कि 'वे पुनर्विचार याचिका दायर करने का इरादा रखते हैं और जब तक समीक्षा याचिका पर विचार नहीं हो जाता, तब तक सज़ा पर बहस की तारीख़ टाल दी जाये.'
गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में प्रशांत भूषण की ओर से खड़े वरिष्ठ वकील दुष्यंत दवे ने सज़ा पर सुनवाई के दौरान बहस की शुरुआत की.
जस्टिस अरुण मिश्र ने दवे से कहा कि 'कोर्ट उन्हें भरोसा दिलाता है कि जब तक वे पुनर्विचार याचिका दाख़िल नहीं कर देते, तब तक कोई सज़ा नहीं होगी.'





दलीलों का दौर





दुष्यंत दवे ने अदालत से कहा कि 'हमें तीस दिन के भीतर समीक्षा याचिका दाखिल करने का अधिकार है.' उन्होंने कहा कि "दोष सिद्ध होना और सज़ा देना, दो अलग मुद्दे हैं. मेरी अपील न्यायिक समीक्षा के तहत बिल्कुल सही है और दण्डाज्ञा को टाला जा सकता है. सज़ा को फ़िलहाल टाल देने से आसमान नहीं गिर पड़ेगा."
इस दौरान वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग के ज़रिये प्रशांत भूषण ने अपनी दलील दी. उन्होंने कहा कि 'कोर्ट अवमानना का दोषी ठहराये जाने से वो बहुत दुखी हैं.' उन्होंने दोहराया कि स्वस्थ लोकतंत्र के लिए आलोचनाओं की जगह होना बहुत ज़रूरी है.





भूषण ने कहा, "मेरे ट्वीट, जिन्हें अदालत की अवमानना का आधार माना गया, वो मेरी ड्यूटी हैं, और कुछ नहीं. उन्हें संस्थानों को बेहतर बनाये जाने के प्रयास के रूप में देखा जाना चाहिए. जो मैंने लिखा, वो मेरी निजी राय है, मेरा विश्वास और विचार हैं, और मुझे अपनी राय रखने का अधिकार है."





महात्मा गांधी का हवाला देते हुए भूषण ने कहा, "न मुझे दया चाहिए न मैं इसकी मांग कर रहा हूं. मैं दरियादिली भी नहीं चाह रहा. कोर्ट जो भी सज़ा देगा, मैं ख़ुशी से स्वीकार करने को तैयार हूं."





इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने प्रशांत भूषण की सज़ा पर सुनवाई टालने की याचिका का खारिज कर दिया. कोर्ट ने कहा कि बिना सज़ा सुनाए न्यायाधीश का निर्णय पूरा नहीं हो सकता.





क्या है मामला





जस्टिस मिश्र दो सितंबर 2020 को रिटायर हो रहे हैं यानी सेवा में उनके पास सिर्फ़ 12 दिन शेष हैं.





14 अगस्त को तीन जजों की बेंच ने कहा था कि 'यह अदालत की अवमानना का गंभीर मामला है. पहली नज़र में हमारी राय ये है कि ट्विटर पर इन बयानों से न्यायपालिका की बदनामी हुई और सुप्रीम कोर्ट, ख़ासतौर पर भारत के चीफ़ जस्टिस के ऑफ़िस के लिए जनता के मन में जो मान-सम्मान है, ये बयान उसे नुक़सान पहुँचा सकते हैं.'





प्रशांत भूषण ने मुख्य न्यायधीश और चार अन्य पूर्व मुख्य न्यायधीशों को लेकर दो ट्वीट किए थे जिन्हें सुप्रीम कोर्ट ने 'न्यायालय पर अभद्र हमला' बताते हुए भूषण को कोर्ट की अवमानना का दोषी ठहराया.
जबकि इसके जवाब में प्रशांत भूषण ने कहा था कि 'विचारों की स्वतंत्रता अदालत की अवमानना नहीं हो सकती.'





भूषण की ओर से यह दलील दी गई थी कि "विचारों की ऐसी अभिव्यक्ति स्पष्टवादी, अप्रिय और कड़वी हो सकती है, लेकिन इसे अदालत की अवमानना नहीं कहा जा सकता."





मामले पर दो तरह के विचार





अदालत की अवमानना के इस मामले पर लोगों के विचार अलग-अलग रहे हैं.
बार एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया (बीएआई) ने भी इस मामले में कहा है कि 'शीर्ष अदालत की प्रतिष्ठा को दो ट्वीट्स द्वारा धूमिल नहीं किया जा सकता. ऐसे समय में जब नागरिक बड़ी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, तो आलोचनाओं से नाराज़ होने की बजाय उनकी जगह बनाये रखने से उच्चतम न्यायालय का क़द बढ़ेगा.'
एक ओर जहाँ बीएआई ने भूषण के समर्थन में बयान जारी किया. वहीं 15 पूर्व जजों समेत सौ से अधिक बुद्धिजीवियों ने सुप्रीम कोर्ट के पक्ष में पत्र जारी किया है. इस धड़े का मानना है कि 'सुप्रीम कोर्ट के निर्णय पर आपत्ति ज़ाहिर करना सही नहीं है.'





दूसरा धड़ा, जो इस मामले में प्रशांत भूषण के समर्थन में है, उसकी राय है कि 'क़ानूनी पेशे से जुड़े एक सदस्य के ख़िलाफ़ भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इस तरह स्वत: अवमानना की कार्यवाही करने का यह तरीक़ा निराशाजनक और चिंतित करने वाला है.'





पंजाब और तमिलनाडु के वकीलों ने प्रशांत भूषण के मामले में चीफ़ जस्टिस को पत्र भी लिखे हैं और अदालत के फ़ैसले की आलोचना की है.





बुधवार को एक ट्वीट में प्रशांत भूषण ने यह दावा भी किया कि अलग-अलग राजनीतिक दलों के 21 नेताओं ने उनके प्रति समर्थन जताया है.





इस बीच सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस कुरियन जोसेफ़ ने भी इस मामले पर एक बयान जारी किया. उन्होंने कहा है कि 'मामले की सुनवाई पाँच या सात जजों की संवैधानिक बेंच को करनी चाहिए.'
शीर्ष अदालत द्वारा स्वत: संज्ञान अवमानना ​​मामलों में पारित किये गए फ़ैसले में इंट्रा-कोर्ट अपील का प्रावधान होना चाहिए. न्याय की विफलता की संभावना से भी बचने के लिए अंतर-न्यायालय अपील की सुरक्षा होनी चाहिए.
उन्होंने कहा कि न्यायमूर्ति सी एस कर्नन के ख़िलाफ़ मुक़दमे में अवमानना ​​का फ़ैसला सात न्यायाधीशों की पीठ द्वारा पारित किया गया था.
उन्होंने यह भी कहा कि "इस तरह के महत्वपूर्ण मामलों को शारीरिक सुनवाई में विस्तृत रूप से सुना जाना चाहिए जहाँ व्यापक चर्चा और व्यापक भागीदारी की गुंजाइश हो."