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37 वर्षीय शाह फ़ैसल ने अपनी ही पार्टी के अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दे दिया. क्या वे फिर से प्रशासनिक सेवा में लौटेंगे ।

गुरुवार, 13 अगस्त 2020 | अगस्त 13, 2020 WIB Last Updated 2021-04-01T09:32:55Z
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सिविल सेवा परीक्षा (UPSC) में जम्मू-कश्मीर के पहले टॉपर शाह फ़ैसल ने पिछले साल काफ़ी नाटकीय अंदाज़ में फैसला लेते हुए सरकारी नौकरी छोड़कर जम्मू-कश्मीर की उलझी हुई सियासत में कदम रखा. उन्होंने 10 साल पहले यूपीएससी परीक्षा में टॉप करके देशभर में चर्चा बटोरी थी और पार्टी की शुरुआत की. पार्टी की शुरुआत के वक़्त शाह फ़ैसल ने दो पन्नों का एक विजन डॉक्यूमेंट जारी किया था जिसमें लोगों को संवैधानिक मूल्यों के ज़रिए मज़बूत बनाने की बात कही गई थी. कश्मीर की राजनीति में बतौर युवा नेता उनके उभरने के क़रीब दो महीने बाद ही भारत सरकार ने जम्मू कश्मीर का 70 साल पुराना विशेष राज्य का दर्जा 5 अगस्त 2019 को ख़त्म कर दिया.





कश्मीर के भारतीय संघ में पूर्ण विलय और इसे दो केंद्र शासित प्रदेशों में बांटने की प्रक्रिया के दौरान प्रशासन ने कश्मीर के सभी बड़े नेताओं को हिरासत में ले लिया. इनमें शाह फ़ैसल भी शामिल थे.





लंबे समय तक घर में नज़रबंद रहने के बाद इस सप्ताह 37 वर्षीय शाह फ़ैसल ने अपनी ही पार्टी के अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दे दिया. इसी के साथ उनके दोबारा प्रशासनिक सेवा में लौटने की अफवाहें भी उड़ने लगीं.





खुद को हिरासत में रखे जाने को वो एक सीख मानते हैं. उनका कहना है कि उन्होंने राजनीति इसलिए छोड़ी है क्योंकि वो जम्मू कश्मीर की परेशान जनता से किए गए अपने वादे को पूरा नहीं कर सकते.





शाह फ़ैसल कहते हैं कि - हां. मुझे यह क़ुबूल करने में कोई झिझक नहीं है.





मैंने संविधान के दायरे में रहकर लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मज़बूत करने की बात कही थी. लेकिन पांच अगस्त के बाद ये सारा मामला इतना अधिक जज़्बाती हो गया कि अगर एक राजनेता कहता है कि हमें इस नई हक़ीक़त के साथ आगे बढ़ना है तो वो ईशनिंदा के जैसा समझा जाएगा





ज़मीनी हक़ीक़त बदल गई है और अब ये वो जगह बिल्कुल नहीं है. इसलिए मैं यहां के नए राजनीतिक हालात को लेकर अपनी समझ स्पष्ट करना चाहता हूं. राजनीतिक रूप से सही नज़र आए बिना यहां राजनीति करना बहुत मुश्किल है. मैं बहुत विनम्रता के साथ राजनीति छोड़ रहा हूं और लोगों को बता रहा हूं कि मैं झूठी उम्मीदें नहीं दिला सकता कि मैं आपके लिए ये करूंगा, वो करूंगा, जबकि मुझे पता है कि मेरे पास ऐसा कर पाने की ताक़त नहीं है.





मेरे इस्तीफ़े ने समस्याएं सुलझाने की बजाय और समस्याएं खड़ी कर दी हैं. जब इरादा असहमति जताने का था तो इसे देशद्रोह बता दिया गया. सिविल सेवाओं के नए प्रतिभागी भी काफ़ी हतोत्साहित हुए. मेरे सहकर्मी भी नाराज़ थे जब मैंने यह फैसला लिया. मैं ऐसा कोई काम नहीं करते रहना चाहता जब मुझे पता कि इससे कुछ बदलने वाला नहीं है. इसलिए मुझे लगा रुक जाना ही अच्छा है. मुझे नहीं लगता इससे युवाओं को परेशान होना चाहिए. दरअसल इससे उन्हें नई राजनीतिक परिस्थिति को और अधिक निष्पक्ष रूप से देखने की ताक़त मिलनी चाहिए.





जिंदगी चलती रहनी चाहिए. हमें नई चुनौतियों का सामना करना होगा और अपनी ज़िंदगी को सार्थक बनाना होगा. हम लंबे समय तक नकार नहीं सकते. इससे तनाव बढ़ता है. हमें सकारात्मकता के साथ भविष्य की ओर देखना चाहिए और जो ज़िंदगी में आ रहा है उसे स्वीकार करना चाहिए. आगे वे कहते हैं मेरे अलग होने का मतलब भरोसा उठना नहीं है. इसका मतलब है नई राजनीतिक परिस्थिति को समझना और मुश्किलों का अहसास होना. अगर मेरे पास कुछ बदलने की ताक़त नहीं होगी तो मैं वहां जाऊंगा ही क्यों.





लोकलुभावन राजनीति से मेरे बहुत से चाहने वाले हो जाएंगे लेकिन उससे मैं कश्मीर में कुछ बदल नहीं पाऊंगा.





पीएसए के तहत मेरी ख़ुद की हिरासत भी मेरे लिए एक बड़ा सबक थी. इससे मुझे ज़िंदगी को अलग ढंग से देखने का मौका मिला. इससे मुझे अहसास हुआ कि स्थिति कितनी जटिल है.





मेरा परिवार मेरे लिए ऐसी कोई बातचीत क्यों करेगा? मेरा परिवार बेहद मामूली पृष्ठभूमि का है और अगर मुझे कुछ बातचीत करनी होगी तो वो मैं खुद करूंगा और खुलेआम करूंगा.





किसी अन्य संघर्ष क्षेत्र की तरह कश्मीर की त्रासदी ये है कि यहां जीवन के छोटे-छोटे मुद्दों को लेकर सर्वसम्मति का अभाव है. हम एक ऐसे समाज में रहते हैं जहां भरोसा बहुत कम है. जब मैंने राजनीति चुनी तो मुझे कठपुतली कहा गया. जब मैं राजनीति छोड़ रहा हूं तब मुझे वही लोग फिर से कठपुतली कह रहे हैं. ऐसे लोगों पर मैं हंसता हूं. इससे मुझे फ़र्क नहीं पड़ता.





नहीं, मुझे लगता है मुख्यधारा की राजनीति जो कि चुनावी राजनीति है वो कभी ख़त्म नहीं हो सकती. हो सकता है राजनीतिक प्रक्रिया शुरू होने में वक़्त लगे लेकिन आप देखेंगे कि आखिरकार लोकतांत्रिक राजनीति शुरू होगी. मैं रहूं या ना रहूं.





और अंत मे वे कहते हैं कि - मैंने कभी सिस्टम नहीं छोड़ा. मैं एक छोटे सिस्टम से दूसरे में शिफ्ट हुआ था. मेरी विशेषज्ञता लोक प्रशासन है और मुझे सरकार के साथ काम करने में कोई परेशानी नहीं है. लेकिन वो कब और कैसे होगा मुझे फिलहाल नहीं पता.


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